दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले
परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले
बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले
मीर तक़ी 'मीर'
उस ने यूँ रास्ता दिया मुझ को
रास्ते से हटा दिया मुझ को
दूर करने के वास्ते ख़ुद से
ख़ुद का ही वास्ता दिया मुझ को
मौत ही कुछ सुकून दे शायद
ज़िंदगी ने थका दिया मुझ को
जब मिरे बाल-ओ-पर शिकस्ता हुए
तब क़फ़स से उड़ा दिया मुझ को
जिस हवा ने मुझे जलाए रखा
फिर उसी ने बुझा दिया मुझ को
"
उलटी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीhरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया
( मीर तक़ी)
"सामने यार हो और होश तेरे गुम नहीं,
या तो वो यार नहीं या फिर आशिक तुम नहीं"!
हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दुआ' नहीं देंगे
ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे
हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को
जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं hi देंगे
रिवायतों की सफ़ें तोड़ कर बढ़ो वर्ना
जो तुम से आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे
यहाँ कहाँ तिरा सज्जादा आ के ख़ाक पे बैठ
कि हम फ़क़ीर तुझे बोरिया नहीं देंगे
शराब पी के बड़े तजरबे हुए हैं हमें
शरीफ़ लोगों को हम मशवरा नहीं देंगे
"Rahat Indori sahab"
ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है
हद-ए-निगाह तक जहाँ गुबार ही गुबार है
ये किस मकाम पर हयात, मुझको लेके आ गई
ना बस खुशी पे जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है
ये क्या जगह है...
तमाम उम्र का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी
ये मेरा दिल कहे तो क्या, ये खुद से शर्मसार है
ये क्या जगह है...
बुला रहा क्या कोई चिलमनों के उस तरफ़
मेरे लिये भी क्या कोई उदास बेक़रार है
ये क्या जगह है...
न जिसकी शकल है कोई, न जिसका नाम है कोतई
इक ऐसी शै का क्यों हमें अज़ल से इन्तज़ार है
ये क्या जगह है...
No
ताउम्र बस एक यही सबक याद रखिये
इश्क और इबादत में नीयत साफ रखिये
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बुझने लगी है जिनदगी कुछ देर जल तो। लें
चलने को हैं यह पाव कुछ देर साथ चल तो ले
फिर से मेरे हाथ में हाथ होना हो
जब रूह में उतर जाता है,
बेपनाह इश्क का समंदर,
लोग जिंदा तो होते है,
मगर किसी और के अंदर !!
मुझे इतना याद आ कर
बेचैन न करो तुम
एक यही सितम काफी है,
कि साथ नहीं हो तुमt
बन के इक हादिसा बाजार में अ जायेगा
जो नहीं हुआ वो अखबार में आ जायेगा
चोर उचको की करो कदर के मालूम नहीं
कौन कब किस की सरकार में आ जायेगा
Rahat Indore
āvāz de ke dekh lo shāyad vo mil hī jaa.e
varna ye umr bhar kā safar rā.egāñ to hai
आवाज़ें दे के देख लो शायद वो मिल ही जाये
वरना यह उम्र भर का सफ़र रायेगां तो है
Munir Niazi
दिल #शाद था के फूल खिलेंगे बहार में
मारा गया ग़रीब इसी ऐतबार में
मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा मिल गया होता
अगर तूफ़ाँ नहीं आता किनारा मिल गया होता
मिली है चाँदनी जिनको ये उनकी अपनी क़िस्मत है
मुझे अपने मुक़द्दर से फ़क़त इतनी शिकायत है
मुझे टूटा हुआ कोई सितारा मिल गया होता
अगर तूफ़ाँ नहीं ...
मुझे तेरी मोहब्बत .. hi
मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़
सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़
शाद अज़ीमाबादी
ज़ख्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से
ख़्वाबों की कोई दुनिया आबाद करें फिर से
नहीॉ हैं पैरो के नीचे जंमीने मैं आसमां पर तारे टांकता हूं
जो मुनासिब लगे वो देना मौला मेरा कया है मैं तो कुछ भी मांगता हूं
K
ख़िज़ाँ की रुत में गुलाब लहजा बना के रखना कमाल ये है
ख़िज़ाँ की रुत में गुलाब लहजा बना के रखना कमाल ये है
हवा की ज़द पे दिया जलाना जला के रखना कमाल ये है
ज़रा सी लग़्ज़िश पे तोड़ देते हैं सब तअ'ल्लुक़ ज़माने वाले
सो ऐसे वैसों से भी तअ'ल्लुक़ बना के रखना कमाल ये है
किसी को देना ये मशवरा कि वो दुख बिछड़ने का भूल जाए
और ऐसे लम्हे में अपने आँसू छुपा के रखना कमाल ये हैu
ख़याल अपना मिज़ाज अपना पसंद अपनी कमाल क्या है
जो यार चाहे वो हाल अपना बना के रखना कमाल ये है
किसी की राह से ख़ुदा की ख़ातिर उठा के काँटे हटा के पत्थर
फिर उस के आगे निगाह अपनी झुका के रखना कमाल ये है
वो जिस को देखे तो दुख का लश्कर भी लड़खड़ाए शिकस्त खाए
लबों पे अपने वो मुस्कुराहट सजा के रखना कमाल ये है - मुबारक़ सिद्दीक़ी
मायने
मेरी आरज़ू मेरी जुस्तजू यहाँ चार सू यही गुफतगु
यहाँ खेल सारा मुफात का कहीं मैं ही मैं कहीं तू ही तू
सब अपनी सोचो में गुम से हैं अहवाल सब ही के तुम से हैं
यहाँ वफ़ा की रविश नहीं यहाँ किसी दुआ में तपिश नहीं
कई रूप धारें हुए हैं सब हिरस के मारे हुए हैं सब
जो तूने अलाह से लौ लगाई तो दिल में खौफे जवाल कैसा
जो उसने थामी है तaकशती तो ढूबने का खयाल कैसा
जो आहटो कि जुबां भी समझे अयां भी समझे निहाॉ भी समझे
गर जीत उसके करम से है फिर तो इस में हारने का मलाल जंमीकैसा
रहीम वो है रहम भी उसका अता भी उसकी करम भी उसका यह तेरी शोहरत यह कामयाबी तो
इस में तेरा कमाल कैसा
उसको देखेंगें जननती तो कहेंगे जननत तो कुँछ नहीं है
तु सोच सकता नही है अहमद के होगा उसका जमाल कैसा
सर आंख से डूडते हो उसे जहाॉनो की कैद में तू
करीब शहरत से भी हो तो फिर फिराक कैसा विसाल कैसा
एक कतरा जब समनंदर में उतरता है तो समंनदर के लहजे में बात करता है
छत के दिये कब से बुछ गये होते कोई तो है जो हवा के पर कतरता है
जमीं की अदालत फिर वहां नही चलती
जब फैसला कोई आसमां से उतरता है