Veena's Musings

Shayari & Ghazals

Couplets and ghazals, many without a name attached. 49 pieces

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Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too

Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Aage bhee jaane naa too
अंजाने सायो काराहो में डेरा है
अंदेखी आंखो ने हम सब को घेरा है
यह रल उजाला है बाकी अंधेरा है
Anjaane saayon ka, raahoon mein deraa hai
Andekhi baahon ne hum sabko gheraa hai
Ye pal ujalaa hai baaqi andhera hai
Ye pal ganvaana naa ye pal hee tera hai
Jenevaale soch le
Yahi vaqt hai kar le pooree aarazu
Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Is pal kee jalwon ne mehafil sanvaari hai
Is pal kee garmee ne dhadakan ubhaari hai
Is pal ke hone se duniyaa hamaari hai
Ye pal jo dekho to sadiyon pe vaari hai
Jenevaale soch le
Yahi vaqt hai kar le pooree aarazu
Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Aage bhee jaane naa too
Is pal ke sae mein apana thikaana hai
Is pal kee aage kee har shay fasaanaa hai
Kal kisne dekha hai kal kisne jaanaa hai
Is pal se paaegaa jo tujko paanaa hai
Jenevaale soch le
Yahi vaqt hai kar le pooree aarazu
Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Aage bhee jaane naa too, peechhe bhee jaane naa too
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai
Jo bhee hai, bas yahi ek pal hai

Aey reyg'zaar-e-hasti

be’aas-o-be’basi ka tu dasht-e-be’kinaara
ऐ रेगजारे हस्ती बेआस-ओ-बेबसी का तू दशते बेकिनारा
तू अगर बुरा ना मानें तुझे हो अगर गवारा
मेरी आरज़ू की लाशें, मेरे हौसलों की क़ब्रें
मैं कहाँ पे जा के ढूँढूँ मुझे कुछ तो दे इशारा
ऐ रेगजारे हस्ती तेरी दस्तरस लकमें जो भी रसतो को अपने भूले
तू रफते सफ़र को लूटे, सिम्तों से उन की खेले
इक खाके बे-जरर है आदम की कीमियां में
तेरी मशते-खुलते-खूं कब तक भला ये झेले
ऐ रेगजारे हसती ये फिराके बतमींजी यह खुमार बेतहाशा
तूने अपनी वुसअतो क्या इसी लिये तराशा
तेरे रोज़ों-शब के क़िस्से देते हैं यह खुलासा
हर शब नये शगुफते हर दिन नया तमाशा

Asir e izareijazat

kamar
हम हैं असीरे जबत इजादत नहीं हमें
रो पा रहें हैं आप बधाई है रोईये
अशको को अरजूं-ऐ-रिहाई है रोईये
आंखों की अब इसी में भलाईहै रोईये
गर खुश हैं तो फिर मुसाफिरे दुनिया नहीं है आप
इस दशत में आबला पाई है रोईये

Ay dost zara aur kareeb e rag e jaan ho Kia janay kahan tak

Ay dost zara aur kareeb e rag e jaan ho Kia janay kahan tak shab-e-hijran
ka dhuwan ho
Mein ek zamanay say tumhein dhoondh raha hon Tum ek zamanay say khuda janay
kahaan ho
Mein uss ko teray naam say taabeer karon ga Wo phool jisay qurbat-e-shabnam
bhi garaaN ho
Shayed yeh meri ankh say girta hua ansooo Ahbaab ki bhooli hoey manzil ka
nishaan ho
ऐ दोस् ज़रा और करिबे रंगे जाँ हो
क्या जाने कहा तक शबें हिजरा का धुआँ हो
मैं इक जमाने से तुझे डूंड रहा हू
तुम एक जमाने से ख़ुदा जाने कहा हो
मैं उसको तेरे नाम से ताबीज़ करूगा
वो फूल जिसे कुरबते शबनम भी गरा् हो
शायद यह मेरी आंख से गिरता हुआ आंसू
अहबाब की भूली हुई मंज़िल का निशाँ हो

Aye khuda ret ke sehra ko samandar kar de

Yah chhalakti huyi
aakho ko bhi
pathar kar de

ऐ खुदा रेत के सहरा को संमनदर कर दें या छलकी हुई आँखों को भी पत्थर कर दे
तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैंने आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर कर दे
और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन मेरी चादर मेरे पेरौ के बराबर कर दे

Bade sookoon

बड सूकून से काटा अजाबे तनहाई
मैं अपने आप से मुदत के बाद मिल पाई
किसी तरह तो बिखरना ही था यह रेत का घर
हवाये जुलम सागर की मौज ले आई
यह सब गलत हैं कि हमे फुरसते खयाल न थी
सहीतो है कोई याद हीं नहीं आई
खताये दोनो की यकसा थी तआजुब है
किसी को दाद मिली और किसी को रूसवाई
जमाना मिटाता रहा हैं सदियो से
रदाये खाक से मैं मिसले गुल निकल पाई

खुद को ईतना मत बचाया कर बारिशे हों तो भीग जाया कर
दरद हीरा है दरद मोती हैं दरदआंखो से मत बहाया कर
काम ले कुछ असीर होंटो से बातो बातो में मुसकाया कर
चांद लाकर कोई नहीं देगा अपने चेहरे से जगमया कर
घूप मायूस लौट जाती हैं छत पे कपडे सुखाने आया कर
कौन कहता है दिल मिलाने को कम से कम हाथ तो मिलाया कर

तेरे ईरदगिरद वो शोर था मेरी बात बीच में रह गई
ना मैं कह सका ना तू सुन सका मेरी बात बीच मेंरह गई
मुझे वहम था तेरे सामने नहीं खुल सकेगी जुबान मेरी
तो हकीकतन भी वही हुआ मेरी बात बीीच में रह गई

बुऐ होऐ बनद ते। कंदा उचियी ओते कच दे टोटे ललाईसन
मैं की जांना लुटन वाले केडे पासो आसन

जिंदगानी हमारी इस मोड से लेके जाती है किस मोड पर देखिये
कही कोई रसता दिखाई न दे दिल जिधर कह रहा हो उधर देखिये

जितना कम सामान रहेगा उतना सफर आसान रहेगा
जितनी भारी गठहरी होगी उतना तू हैरान रहेगा
उससे मिलना नामुमकिन है जब तक खुद का धयान रहेगा
हाथ मिले और दिल ना मिले ऐसे में नुकसान रहेगा
जब तक मनदिर और मसजिद हैं मुyशकिल में इंसान रहेगा
नीरज तो कल यहा ना होगा उसका गीत विधान रहेगI

गोपाल दास नीरज

Badla Jo Waqt Gheri Rafaqat Badal Gayi
Suraj Dhala To Saye ki Surat Badal Gayi
Ek Umar tak Mein Uski Zarorat Bana Raha
Phir Yun Hua k Uski Zarorat Badal Gayi

फिरदी कितथे दुनीया सारी
रब ती खोज विचं मारी मारी
चाहना जे तू रब दी यारी हो जा मां दे सदके वारी
पयो दा तू आखां ना मोडी
भैना दा वी दिल ना तोडी
सब तूं सोनया फरज निभावी बचया रिजक हलाल खूवांवी
पूरा तोली मिठा बोली भेंद किसी दा कदे ना खोली
सच बोली ते सच दा खांवी दुखी दिलां दा दरद मटावी

उनहे कामयाबियो में सूकून नजर आया तो वो भागते रहे
हमें सूकून में कामयाबी दिखाइ दी तो हन ठहर गयें
खवाहिशो के बोझ में ऐ बशर तू कया कया कर रहा हैं
ईतना तो जीना भी नही जितना तू मर रहा है

तदच

Bahe Na Kabhi Nain Se Neer

बहे न कभी नैन से नीर
उठी हो चाहे दिल में पीर
बाँवरे यही प्रीत की रीत
बाँवरे यही प्रीत की रीत
बहे न कभी नैन से नीर
उठी हो चाहे दिल में पीर
बाँवरे यही प्रीत की रीत
बाँवरे यही प्रीत की रीत
आशायें मिट जायें तो मिट जायें
दिल की आहें कभी न बाहर आयें
आशायें मिट जायें तो मिट जायें
दिल की आहें कभी न बाहर आयें
कभी न बाहर आयें
भरी हो होंठों पर मुस्कान
न कोई ले दिल को पहचान
इसी में है रे तेरी जीत
बाँवरे यही प्रीत की रीत
दीपक जले भवन में रहे पतंगा बन में
प्रीत खींच कर लायी उसे जलाया क्षण में
दीपक जले भवन में रहे पतंगा बन में
प्रीत खींच कर लायी उसे जलाया क्षण में
जलन का उसे कहाँ था होश
प्यार का चढ़ा हुआ था जोश
गा रही दुनियाँ उसकी
बाँवरे यही प्रीत की रीत
बहे न कभी नैन से नीरi
उठी हो चाहे दिल में पीर
बाँवरे यही प्रीत की रीत
बाँवरे यही प्रीत की रीत

Bhupinder

Bहुपिन्देर:
किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है
कहाँ हो तुम कि ये दिल बेक़रार आज भि है

Bहुपिन्देर:
वो वादियाँ वो फ़ज़ायें कि हम मिले थे जहाँ
मेरी वफ़ा का वहीं पर मज़ार आज भी है

Bहुपिन्देर:
न जाने देख के क्यों उन को ये हुआ एहसास
कि मेरे दिल पे उंहें इख़्ह्तियार आज भी है

आश:
वो प्यार जिस के लिये हमने छोड़ दी दुनिया
वफ़ा की राह पे घायल वो प्यार आज भी है

आश:
वो प्यार जिस के लिये हमने छोड़ दी दुनिया
वफ़ा की राह पे घायल वो प्यार आज भी है

Bहुपिन्देर:
यकीं नहीं है मगर आज भी ये लगता है
मेरी तलाश में शायद बहार आज भी है

आश:
न पूछ कितने मोहब्बत के ज़ख़्ह्म खाये हैं
कि जिन को सोच के दिल सोग़वार आज bhi hai
Kisi Nazar Ko Tera Intezar Aaj Bhi Hai lyrics in Hindi

किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है
फ़िल्म – ऐतबार (1985)

संगीतकार – बप्पी लाहिरी

गीतकार – हसन कमाल
स्वर – आशा भोंसले, भूपिंदर सिंह

Bohat farsooda lagte hain mujhe ab yaar ke kissey

Gul o gulzar ki batain lab o rukhsaar ke kisse,,
Yahan sab ke mukaddar main fakat zakhm e judai hai
Sabhi jhootay fasane hain wasal-e-yaar ke kisse,,
Bhala ishq-o-mohabbat se kis ka pait bharta hai
Suno ! tum ko sunata hoon mein karobar ke kisse,
मेरे ehbaab kehte hain yehi
े ik aeb hai mujh main
Sare deewar likhta hon main pasey deewar ke kisse,,
Main aksar es liye logon se ja kar khud nahin milta
Wohi bekaar ki batain ‘ wohi bekar se kisse

बहुत फरसूदा लगते हैं मुझे अब यार के किसे
गुलों गुलज़ार की बातें लबों रुखसार के किसे
यहाँ सब के मुक़द्दर में फ़क़त ज्खमे जुदाई है
सभी झूठे फँसाने हैं विसाले यार के क़िस्से
I भला इश्क़ अ मुहब्बत में किसी का पेट भरता है
सुनो तुम को सुनाता हूँ मैं कारोबार के किसे
मेरे अहबाब कहते हैं यही बस ऐब है मुझमें
सरे दीवार लिखता हू् प्ले दीवार के किसे
मैं अक्सर इस लिये लोगों से जा कर नहीं मिलता
वहीं बेकार की बातें वहीं बेकार से किसे

Darwaza khula rakho

Dil ko choo jati hae raat ki awaz kabhi
chonk uth’ta hon kahin tumne pukara hi na ho
marnay ke baad bhi meri ankhen khuli raheen
adat pari hovee thee teray intezar ki
kuch haar piro dalo gul’dastay bana rakho
araasta mehraben aangan mein saja rakho 
Farsh-e-dil-o-jan yonhi ta-subh bicha rakho
hay raat andheri ye chokat pe diya rakho
shayad ke woh ajayen, darwaza khula rakho
yaad aa hi gai hogi, ab aa hi raha hoga
dar jaye na rastay main, sunsaan bada hoga
muddat se nahi aaya ab yaad bhi kya hoga
dehleez pe ja betho ghar bhool gaya hoga

aaker na palat jaye, darwaza khula rakho
kya meri lagan ab tak waisi hi lagi hogi
kya mil ke usay ab bhi waisi hi khushi hogi
kya chah meri usko waisi hi abhi hogi
ya mujh se bichar kar phir kuch aur badhi hogi
najanay kab ajaye, darwaza khula rakho
aisa na ho kay yeh shab phir yun hi guzar jaye
ta subho yunhi tarpoon tab bhi na magar aye
jab bhi koi ahat ho dam aank mein aa jaye
reh reh ke nazar uthay mayos palat aaye
shayad magar ajaye, darwaza khula rakho
kuch haar piro dalo gul’dastay bana rakho
araasta mehraben angen mae saja rakho

hum ne har dukh ko mohabat ka tasalsul samjha

hum koi tum they k dunya se shikayat karte..

ham ne sokhi hui shakhon pe lahu chirka tha..
phool agar ab b na khilte to khasara karte..

hum agar chup hain to is ko b ganimat jano..
hum agar sabar na kartay to qayamat kartay..

hum ko mal0om hai dushman k sabhi thikan0 ka pata..
shareek e jurm na hotay tou mokhbari kartay..

ki muhabat to siyasat kay chalan chor diye..
hum agar ishq na karte to hukumat karte..

Ik shakhs ke kho janay ka dar kiyun nahin jata

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ईक शखस के खो जाने का डर कयू नही जाता
यह बोझ मेरे दिल से उतर कयु नही जाता
मनजिल पे पहुँच कर भी उसे खोना पडेगा
यह तय है तो फिर शौक़े सफ़र यjiकयु नहीं जाता
मैं जब भी तराशू तेरा पैकर ही तराशू
यह जोके नज़र यह शौक़े हुनर कयू नही जाता
यह वकत तुझे मुझसे जुदा कर तो रहा है
यह वकत ईसी वकत ठहर कयु नही जाता
है तुझसे बिछड़ने का है रजं मुझे इतना
तो शिंदते जज़्बात से मैं मर कयु नहीं जाता

Ik shakhs ke kho janay ka dar kiyun mahin jata
ye bojh meray dil se utar kiyun nahin jata
manzil pe puhanch ker bhi usay khona pade ga
ye tay hai to phir shauq-e-safar kiyun nahin jata
main jab bhi tarashon, tera paikar hi tarashon
ye zauq-e-nazar, ye shauq-e-hunar kiyun nahin jata
yde waqt tujhay mujh se juda kar ton raha hai
ye waqt issi waqt thehar kiyun nahin jata
gar tujh se bicharnay ka hay ranj mujhay itna
tu main shiddat-e-jazbaat se mar kiyun nahin jata

Jo Khush Hota Hai Wo Mutmain Hota Hai

◦ जो ख़ुश होता है वो मुतमईन होता ke f
जोमुतमईन होता है वो अमल करता है
जो अमल करता है वो बामुराद होता है
जो बामुराद होता है वो सुरखरू होता है

फ़र्ज़ होते हैं आंसुओं के सजदे मर्ज़ होते हैं आंसुओं के सजदे
मगर ‘जब ज़ब्त की अजान होती है बहुत मुश्किल है ज़ब्त का उजू संभालना
बड़ी लम्बी ये सब्र की नमाज़ होती है

Jo tune allah se lau laga

जो तूने अलाह से लौ लगाई तो दिल में खौफे जवाल कैसा
जो उसने थामी है तaकशती तो ढूबने का खयाल कैसा
जो आहटो कि जुबां भी समझे अयां भी समझे निहाॉ भी समझे
गर जीत उसके करम से है फिर तो इस में हारने का मलाल जंमीकैसा
रहीम वो है रहम भी उसका अता भी उसकी करम भी उसका यह तेरी शोहरत यह कामयाबी तो
इस में तेरा कमाल कैसा

उसको देखेंगें जननती तो कहेंगे जननत तो कुँछ नहीं है
तु सोच सकता नही है अहमद के होगा उसका जमाल कैसा
सर आंख से डूडते हो उसे जहाॉनो की कैद में तू
करीब शहरत से भी हो तो फिर फिराक कैसा विसाल कैसा

Kabhi aah

कभी आह लब पे मचल गयी कभी अश्क़ आखं से ढल गये
यह तुम्हारे ग़म के चराग है कभी बुझ गये कभी जल गये
मैं खंयालो ख़्वाब की महफ़िलें ना बकारों शौक़ सजा सका
तेरी इक नज़र के साथ ही मेरे सब इरादे बदल गये
कभी रहा में रंग मेकभी रुप में कभी छाँव में कभी धुप में
कहीं आफताबे नज़र है वो कभी माँहताब में ढल गये

जो फ़ना हुए गमे इश्क़ में ऊनहे ज़िंदगी का ना ग़म हुआ
जो ना अपनी आग में जल सके वो पराई आग में जल गये
था उंनहे भी मेरी तरह जुंन तो फिर उन में मुझ में यह फ़र्क़ कंयु
मैं गिरफ़्ता ग़म से ना बच सका, वो हदूदे ग़म से निकल गये

Kabhi Laut Aye To Puchna

Nahin Dekhna Unhe Ghor Se
Jinhe Raasty Me Khabar Hui
K Ye Raasta Koi Aur Hai

मरहले इशक के दुशवार हुआ करते हैं
सायेे भी राह की दीवार हुआ करते है
वो जो सच बोलते रहने की कसम खाते है
वो अदालत में गुनहगार हुआ करते हैं
सिरफ हाथो कोना देखो कभी आांखे भी पडों
कुछसवाली बडे खुदार हुआ करते है
वो जो पतथर यं ही रसते में पडे रहते हैं
हैउनके सीने में भी शाहकार हुआ करते हैं
सुख की पहल किरन से जिनको रुला देती हैं
वो सितारो के आलादार हुआ करते हैं
शरम आती हैं कि दुशमन के सितम ना समझे
दुशमनी के भी मे तो मयार हुआ करते हैं

इक शखस कया गया के पूरा काफला गया
तूफां ता तेज पेड को जडसे हिला गया

जब सलतनत से दिलकी ही रानी चली गई
फिर कया मलास तखत गया या किला गया

सुख की पह

Kate

गमों की आच में भी मुसकरा के चलना पडता है
यह दुनिया है यहां चेहरा सजा के रखना पडता है
तुमहारा कद हमारे। कद से बहुत उचां सही
चडाई पर कमर सबको झुका के चलना पडता है

बस यही झिझक है हाले दिल सुनाने में
के तेरा जिकर भी आयेगा उस फसाने में
बरस पडी है जो रूख से नकाब उठाने में
वो चांदनी भी आई है मेरे गरीब खाने में
इसी। में इशक की किसमत भी बदल सकती थी
जो वकत बीत गया मुझको आजमाने में
यह कह के टूट पडा शाखे गुल से आखिरी फूल
के अब और देर है कितनी बहार आने में
इ

Kaun samjhaye

कौन समझाये उनहे ईतनी जलन ठीक नहीं
यह जो कहते है मेरा चाल चलन ठीक नहीं
जलो वहां जहां उजालो की जरूरत हो
उजालो में चिरागो की तपन ठीक नहीं
झूट को सच में बदलना
भी हुनर हैं लेकिन अपने ऐबो को ँछुपाने का ये फन ठीक नहीं
उन की नियत मे खलल है तो घर से ना निकले
तेज् बारिश में का मिटटी का बदन ठीक नहीं
शौक से छोड के जाएं ये चमन वो पंछी
जिनको लगता है अपना वतन ठीक नहीं
हर गली चुप सी रहे और रहें सननाटे
मेरे इस मुलक में ऐसा भी अमन ठीक नहीं
जो लिबासो को बदलने का शौक रखते थे
आखिरी। वकत ना कह पाये कफन ठीक नहीं

Khawab

Aisa Hai Ke Sab Khwaab Musalsal Nahin hote

Aisa hai k. Z e Aisa Hai Ke Sab Khwaab Musalsal Nahin Hote

Aisa hai k. Z e sab khwaab musalsal nahin hote, Jo aaj hote hain magar kal
no nahin hote,
Andar ki fazaaon ke karishme bhi ajab hain, Menh toot ke barse bhi to badal
nahin hote,
Kuch mushkilen aisi hain ke asaan nahin hoti'n, aise mu'amme hain kabhi hal
nahin hote,
Sha'istagi-e-ghum ke sabab oloaankhon ke sehraa, Namnaak to ho jaate hain
jal-thal nahin hote,
Kaise hi talaatum ho'n magar qulzum-e-jaa'n main, Kuch yaad jazeere hain ke
ojhal nahin hote,
Ushshaq ke maanind kai ehl-e-hawas
Pagal to nazar aate hai pagal nahi hote

Sha'istagi-e-ghum ke sabab aankhon
ke sehraa,
Namnaak to ho jaate hain jal-thal ji
nahin hote,

hote,
Sab khwaahishen poori ho'n faraz aisa nahin hai, Jaise kai ash'aar mukammal
nahin hote..!!
_ Ahmad Faraz

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते

अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं
मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते

कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं
कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते

शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा
नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते

कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में
कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते

उश्शाक़ के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी
पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते

सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
___ Mu'amme = puzzles, Sha'istagi-e-ghum = genteelness of sorrow, Talaatum
= dashing of waves, sea-storm, Qulzum-e-jaa'n = river of life, Ushshaaq =
lovers, Ehl-e-hawas = people of lust, ___

shola tha jal-bujha hoon hawaaein mujhe na do
main kab ka ja chuka hoon sadaaein mujhe na do

jo zahar sab khwaab musalsal nahin hote, Jo aaj hote hain magar kal no
nahin hote,
Andar ki fazaaon ke karishme bhi ajab hain, Menh toot ke barse bhi to badal
nahin hote,
Kuch mushkilen aisi hain ke asaan nahin hoti'n, Kuch aise mu'amme hain
kabhi hal nahin hote,
Sha'istagi-e-ghum ke sabab aankhon ke sehraa, Namnaak to ho jaate hain
jal-thal nahin hote,
Kaise hi talaatum ho'n magar qulzum-e-jaa'n main, Kuch yaad jazeere hain ke
ojhal nahin hote,
Ushshaq ke maanind kai ehl-e-hawas

Sha'istagi-e-ghum ke sabab aankhon
ke sehraa,
Namnaak to ho jaate hain jal-thal in
nahin hote,

hote,
Sab khwaahishen poori ho'n faraz aisa nahin hai, Jaise kai ash'aar mukammal
nahin hote..!!
_ Ahmad Faraz

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते

अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं
मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते

कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं
कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते

शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा
नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते

कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में
कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते

उश्शाक़ के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी
पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते

सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
___ Mu'amme = puzzles, Sha'istagi-e-ghum = genteelness of sorrow, Talaatum
= dashing of waves, sea-storm, Qulzum-e-jaa'n = river of life, Ushshaaq =
lovers, Ehl-e-hawas

Khud ko

खुद को इतना भी मत बचाया कर
बारिशें हो तो भीग जाया कर
काम ले कुछ हसीन होटो से
बातो बातो में मुसकुराया कर
चादं ला कर कोई नहीं देगा अपने चेहरे से जगमया कर

Khuda

उस को मिले दोनो जहां जिसे तूने दर पे बुला लिया
तेरी नजर की वो कशिश हुई कि जंमाने भर के झुका लिया
तेरा ईशक मेरासूरूर हैं मेरी बनदगी भी तो अजीब। है
जहां यार ने कदम दीये मैने वहा काबा बना लिया

Kirdar

किरदार मुखतसर था
कहानी में हम भी थे
दो चार दिन तो किसाये फानी में हम भी थे
हर शखस हम से खुश रहे मुमकिन नही है ये
डूबे हुओं के गिला है के पानी में हम भी थे
रायें बनाने वाले जरा रफतगी से पूछ
E he be
Le

खुदा के सामने सर अपना झुका दिया हमने
अब किसी के सामने सर झुका नहीं सकता
कुछ इस तरह ठहरा हूँ इश्क़ नगरी में कि जाना चाहूँ भी तो जा नही सकता
जिस में मालिक ने मच्छर का पर भी नहीं समझ आया
ऐसी दुनिया में मैं अब तो जा नहींसकता

साजिशे लगती हैं ये तुझ को मुझ से मिलाने की
कहानी बस ईतनी थी मुझ तक तेरे आने की
मैं इनतिजार में था तेरी देर थी बुलाने की
आरजू में मुबतला था दिल मेरा

तकदीरो को जरूरत थी बस एक बiहाने की
अब तेरा ही इक साया है दिल पे जो है चल रहा
आने के किसी के कोई है निकल रहा
जो कल था वो कल रहाo Veena

Kis raat ki aankhon main paiman-e-sahar ho ga

Kis raat ki aankhon main paiman-e-sahar ho ga Yay khwaab jo kompal hai, kis
rutt main shajar ho ga
Aanchal ki hawa rakhna, loo iss ki bacha rakhna Yay shama jidhar ho gi,
parwana udhar ho ga
Jab raat kay parday say phir raat nikal ayay Uss waqt kidhar jayay, jo
ehhl-e-nazar ho gaदर Tareekh kay chakar main जजwomorhnahiaata Jab shaad
makee.n hon gay, aabaad nagar ho ga
Bujhtay huay taroon ki jhilmil bhi ghaneemat hai Iss tehri hui shab main,
kuch wehm-e-safar ho ga
Afkaar pay pehra hai, qanoon yay tehra haiमत हैीमत है गाीJo sahib-e-izzat
hai wo shehr-e-badar ho ga
Mehsoos yay hota hai, har jalta hua tara Guzray huay waqton main ik
zakhm-e-safar ho ga
Sehmay huay panchi ki awaaz batati hai Uss ka bhi yaheen koi, jalta hua
ghar ho ga …

किस रात की आँखों में पैमाना-ए-सहर होगा
यह ख़्वाब जो कोंपल है किस रूप में शजर होगा
आँचल की हवा रखना लू इस की बचा रखना यह शंमा जिधर होगी परवाना उधर होगा
जब रात के पर्दे से फिर रात निकल आये
उस वकत किधर जायें जो अगले नज़र होगा
तारींख के चक्कर में वो मोहरा नहीं आता जब शाद मकींन होंगे आबाद नगर होगा
बुझते हुए तारों की झिलमिल भी ग़नीमत है इस ठहरी हुई शब में कुछ वहमें सफ़र
होगा
अलंकार पे पहरा है क़ानून यह ठहरा है जो साहिबे इज़्ज़त है वो शहरे बदर होगा
महसूस यह होता है हर जलता हुआ तारा गुज़रे हुए वकतो में इक ज़ख़्में सफ़र होगा
सहमे हुए पंछी की आवाज़ बताती है उस का भी यहीं कोई जलता हुआ घर होगा

Kisi bashar mein

किसी बशर में अगर जो देखो हजा्र खामी तो चुप ही रहना

किसी बशर का जो राज् पाओ या एब देखो तो चुप ही रहना
अगर मनादो को लोग आयें तुमहे कुरेदे तुमहें मनाये
तुमहारी हसती के गीत गांयें

tतुमहे कहें कि उस बशर की बुरांयो को बयान कर दो
तो चुप ही रहना

जवाजं ये है दलील ये है कि जवाल लमहो की लजतो को
हराम नातो की कुरबतो को
हमारी सारी खसासतो (खसाइसो) को
हमारी सारी हिमाकतो को
वो जानता है वो देखता है मगर वो चुप है
अगर वो चुप है तो मेरी मानो वो कह रहा है के चुप ही रहना

जब कहा था मुहबबत गुनाह तो नहीं
फिर गुनह के बराबर सजां कयू मिली
जंखम देते हो कहते हो कि सीते रहो
जान लेके कहोगे कि जीते रहो
पयार जब भी जंमी पर उतारा गया
जिंदगी तुझको सदके में वाारा गया
पयार जिंदा रहा मकतhलो में मगर
पयार जिसने किया वो तो मारा गयाh

KISI DARD MAND KE KAM AA

KISI DOOBTE KO UCHAL DE
YEH NIGAHEN MUST KI MUSTIYAN
KISI BAD NASEEB PA DALDE
MUJHE MUSJIDON KI KHABAR NAHEIN
MUJHE MANDARON KA PAATA NAHEIN
MERI AAJZI KO KABOOL KAR
MUJHE AUR DARD O MALAL DE
MUJHE ZINDGI KI TALAB NAHEIN
MUJHE SO BARAS KI HAWAS NAHEIN
MERE KALAKON KO MAHOO KAR
WO FANA JO HAYE LA-ZAWAL immortal DE
YEH MAE KASHI KA GURUR HAYE
YE MERE DIL KA SUROOR HAYE
MERE MAKADE KO DOWAAM secondHO
MERE SAAQIYON KO JAMAL beauty is DE
MEIN TERE WISAAL KO KYA KARON
MERI WEHSHATOON KI YEH MOT HAI
HO TERA JUNOON MUJHE PHIR ‘ATAA
MUJHE JANAATO SE NIKAL DE
◦

Krishan

Shri krishan ne saaf kaha hai ke karam तुम्हारा कल होगा
करममें ग़र सचाई है तो क्रम कहा निसफल होगा
हर एक संकट का हल होगा वो आज नहीं तो कल होगा
लोहा जितना तपता है उतनी ही ताक़त भरता है
सोना जितना जलता है उतना ही प्रखर निकलता है
हीरे पर जितनी धार चले वो उतना खूब चमकता है
मिटी का बर्तन पकता है फिर धुन पर खूब खनकता है
सूरज जैसा बनना है तो सूरज जैसा जलना होगा
और हम आदम के बेटे हैं कयू सोचे राह सरल होगा
कुछ ज़्यादा वकत लगेगा पर संघर्ष ज़रूर सफल होगा
हर इक संकट का हल होगा वो आज नहीं तो कल होगा

Kyun Na Hum

Kyun na hum ehd-e-rafaqat ko bhulane lag jayain
Shayed us zakhm ko bharne mein zamane lag jayain
Nahin aisa bhi ke ek umar ki qurbat ke nashe
Aik do roz ki ranjish se thikane lag jayain
Yahi naseh jo humain tujh se na milne ko kahain
Tujh ko dekhain to tujhe dekhne aane lag jayain
Hum ke hain lazzat-e-aazaar ke maare huye log
Charahgar aayain to zakhmon ko chupane lag jayain
Rabt ke sainkron heele hain,muhabbat na sahi
Hum tere sath kisi aur bahane lag jayain
Saqiya! Masjid-o-maktab to nahin maikhana
Dekhna,phir bhi ghalat log na aane lag jayain
Qurb acha hai magar itni bhi shiddat se na mil
Yeh na ho tujh ko mere rog purane lag jayain
Ab Faraz aao chalain apne qabeele ki taraf
Shairi tark karain bojh uthanay lag jain

mere saath tum bhi dua karo yun kisi ke haq mein bura na ho
mere saath tum bhi dua karo yun kisi ke haq mein bura na ho
kahin aur ho na ye hadsa koi raaste mein judaa na ho
mere ghar se raat ki sej tak vo ik aansu ki lakir hai
zaraa barh ke chand se puchna vo isi taraf se gayaa na ho
sar-e-shaam Thehari hui zamin, aasman hai jhuka hua
isi mod par mere vaaste vo chiragh le kar khada na ho
vo farishte aap hi Dhoondiye kahaniyon kii kitaab mein
jo buraa kahein na buraa sunay koi shaKhs un se Khafa na ho
vo visaal ho ke firaaq ho teri aag mahakegii ek din
vo gulaab ban ke khilegaa kyaa jo chiragh ban ke jalaa na ho
mujhe yun lagaa ki Khaamosh Khushbu ke hont titali ne chu liye
inhi zard patton ki oT mein koi phool soyaa huaa na ho
isii ehatiyaat mein main rahaa, isi ehatiyaat mein vo rahaa
vo kahan kahan mere saath hai kisi aur ko ye pata na ho...

Main Khayal Hoon

Main Khayal Hoon Kisi

Main Kisi Ke Dast-e-Talab Main Hoon Tou Kisi Ke Harf-e-Dua Main
I am in the desiring hands of some and in the praying words of some
(Dast : hand; Talab : desire; Harf-e-dua : words of prayers)

Main Naseeb Hoon Kisi Aur Ka Mujhe Maangta Koi Aur Hai
I am the destiny of someone, but I am demanded by someone else

Ajab Aitbaar-o-Be Aitbaari Ke Darmiyan Hai Zindagi
My life is hanging in the balance of belief and disbelief

Main Qareeb Hoon Kisi Aur Ke Mujhe Jaanta Koi Aur Hai
I am close to someone, but I am well known to someone else

Meri Raushni Teray Khadd-o-Khaal Se Mukhtalif Tou Nahi Magar
My appearance is not different from yours but
(Khadd-o-Khaal : appearence; Mukhtalif : different)

Tu Qareeb Aa Tujhe Dekh Loon Tu Wohi Hai Ya Koi Aur Hai
Come near, I want to see if you are the same or someone else

Tujhe Dushmano Ki Khabar Na thi, Mujhe Doston Ka Pata Nahi
You didn't know about your enemies, I am not aware of my friends

Teri Daastaan Koi Aur Thi , Mera Wakiya Koi Aur Hai
Your tale was something different, mine was something else

Wohi Munsifon Ki Rivaayatain Wohi Faislon Ki Eibaaratain
The same old traditions of judges and the same wrong decisions of the court
(Munsif : judge; Rivaayat : tradition; Eibaarat : diction, style)

Mera Jurm Tou Koi Aur Tha Par Meri Saza Koi Aur Hai
My crime was something different, but my punishment was for something else

Kabhi Laut Aen Tou Puchna Nahi, Dekhna Unhe Ghaur Se
When they return back, don't ask just see them attentively

Jinhay Rastay Main Khabar Hue Ke Ye Rasta Koi Aur Hai
Those who found in the middle of the journey that this road is leading to somewhere else

Jo Meri Riyaazat-e-neem-shab Ko “Saleem” Subah Na Mil Saki
Saleem, if my religious exercises at midnight don't get rewarded
(Riyaazat-e-neem-shab : religious exercises at mid-night)

To Phir Is Ke Maa'ney To Ye Huwaye Ke Yahaan Khuda Koi Aur Hai
Then this will mean that the God here is someone else

More sheyers

दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले
मीर तक़ी 'मीर'

उस ने यूँ रास्ता दिया मुझ को
रास्ते से हटा दिया मुझ को
दूर करने के वास्ते ख़ुद से
ख़ुद का ही वास्ता दिया मुझ को

मौत ही कुछ सुकून दे शायद
ज़िंदगी ने थका दिया मुझ को

जब मिरे बाल-ओ-पर शिकस्ता हुए
तब क़फ़स से उड़ा दिया मुझ को

जिस हवा ने मुझे जलाए रखा
फिर उसी ने बुझा दिया मुझ को
"

उलटी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीhरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया
( मीर तक़ी)

"सामने यार हो और होश तेरे गुम नहीं,
या तो वो यार नहीं या फिर आशिक तुम नहीं"!

हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दुआ' नहीं देंगे

ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे

हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को

जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं hi देंगे

रिवायतों की सफ़ें तोड़ कर बढ़ो वर्ना

जो तुम से आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे

यहाँ कहाँ तिरा सज्जादा आ के ख़ाक पे बैठ

कि हम फ़क़ीर तुझे बोरिया नहीं देंगे

शराब पी के बड़े तजरबे हुए हैं हमें

शरीफ़ लोगों को हम मशवरा नहीं देंगे

"Rahat Indori sahab"

ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है
हद-ए-निगाह तक जहाँ गुबार ही गुबार है
ये किस मकाम पर हयात, मुझको लेके आ गई
ना बस खुशी पे जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है
ये क्या जगह है...

तमाम उम्र का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी
ये मेरा दिल कहे तो क्या, ये खुद से शर्मसार है
ये क्या जगह है...

बुला रहा क्या कोई चिलमनों के उस तरफ़
मेरे लिये भी क्या कोई उदास बेक़रार है
ये क्या जगह है...

न जिसकी शकल है कोई, न जिसका नाम है कोतई
इक ऐसी शै का क्यों हमें अज़ल से इन्तज़ार है
ये क्या जगह है...

No
ताउम्र बस एक यही सबक याद रखिये
इश्क और इबादत में नीयत साफ रखिये

——-
बुझने लगी है जिनदगी कुछ देर जल तो। लें
चलने को हैं यह पाव कुछ देर साथ चल तो ले
फिर से मेरे हाथ में हाथ होना हो

जब रूह में उतर जाता है,
बेपनाह इश्क का समंदर,
लोग जिंदा तो होते है,
मगर किसी और के अंदर !!
मुझे इतना याद आ कर
बेचैन न करो तुम
एक यही सितम काफी है,
कि साथ नहीं हो तुमt

बन के इक हादिसा बाजार में अ जायेगा
जो नहीं हुआ वो अखबार में आ जायेगा
चोर उचको की करो कदर के मालूम नहीं
कौन कब किस की सरकार में आ जायेगा
Rahat Indore

āvāz de ke dekh lo shāyad vo mil hī jaa.e
varna ye umr bhar kā safar rā.egāñ to hai
आवाज़ें दे के देख लो शायद वो मिल ही जाये
वरना यह उम्र भर का सफ़र रायेगां तो है
Munir Niazi

दिल #शाद था के फूल खिलेंगे बहार में
मारा गया ग़रीब इसी ऐतबार में

मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा मिल गया होता
अगर तूफ़ाँ नहीं आता किनारा मिल गया होता

मिली है चाँदनी जिनको ये उनकी अपनी क़िस्मत है
मुझे अपने मुक़द्दर से फ़क़त इतनी शिकायत है
मुझे टूटा हुआ कोई सितारा मिल गया होता
अगर तूफ़ाँ नहीं ...
मुझे तेरी मोहब्बत .. hi

मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़
सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़
शाद अज़ीमाबादी

ज़ख्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से
ख़्वाबों की कोई दुनिया आबाद करें फिर से

नहीॉ हैं पैरो के नीचे जंमीने मैं आसमां पर तारे टांकता हूं
जो मुनासिब लगे वो देना मौला मेरा कया है मैं तो कुछ भी मांगता हूं
K
ख़िज़ाँ की रुत में गुलाब लहजा बना के रखना कमाल ये है
ख़िज़ाँ की रुत में गुलाब लहजा बना के रखना कमाल ये है
हवा की ज़द पे दिया जलाना जला के रखना कमाल ये है

ज़रा सी लग़्ज़िश पे तोड़ देते हैं सब तअ'ल्लुक़ ज़माने वाले
सो ऐसे वैसों से भी तअ'ल्लुक़ बना के रखना कमाल ये है

किसी को देना ये मशवरा कि वो दुख बिछड़ने का भूल जाए
और ऐसे लम्हे में अपने आँसू छुपा के रखना कमाल ये हैu
ख़याल अपना मिज़ाज अपना पसंद अपनी कमाल क्या है
जो यार चाहे वो हाल अपना बना के रखना कमाल ये है

किसी की राह से ख़ुदा की ख़ातिर उठा के काँटे हटा के पत्थर
फिर उस के आगे निगाह अपनी झुका के रखना कमाल ये है

वो जिस को देखे तो दुख का लश्कर भी लड़खड़ाए शिकस्त खाए
लबों पे अपने वो मुस्कुराहट सजा के रखना कमाल ये है - मुबारक़ सिद्दीक़ी
मायने

मेरी आरज़ू मेरी जुस्तजू यहाँ चार सू यही गुफतगु
यहाँ खेल सारा मुफात का कहीं मैं ही मैं कहीं तू ही तू
सब अपनी सोचो में गुम से हैं अहवाल सब ही के तुम से हैं
यहाँ वफ़ा की रविश नहीं यहाँ किसी दुआ में तपिश नहीं
कई रूप धारें हुए हैं सब हिरस के मारे हुए हैं सब

जो तूने अलाह से लौ लगाई तो दिल में खौफे जवाल कैसा
जो उसने थामी है तaकशती तो ढूबने का खयाल कैसा

जो आहटो कि जुबां भी समझे अयां भी समझे निहाॉ भी समझे
गर जीत उसके करम से है फिर तो इस में हारने का मलाल जंमीकैसा
रहीम वो है रहम भी उसका अता भी उसकी करम भी उसका यह तेरी शोहरत यह कामयाबी तो
इस में तेरा कमाल कैसा

उसको देखेंगें जननती तो कहेंगे जननत तो कुँछ नहीं है
तु सोच सकता नही है अहमद के होगा उसका जमाल कैसा
सर आंख से डूडते हो उसे जहाॉनो की कैद में तू
करीब शहरत से भी हो तो फिर फिराक कैसा विसाल कैसा

एक कतरा जब समनंदर में उतरता है तो समंनदर के लहजे में बात करता है
छत के दिये कब से बुछ गये होते कोई तो है जो हवा के पर कतरता है
जमीं की अदालत फिर वहां नही चलती
जब फैसला कोई आसमां से उतरता है

Muhabbat

जंहा ये ढूढता है ख़ाक के पुतले में मुहबत
वहाँ एनसान को ईस की हिमाक़त मार देती ह
कहीं पर चुप कर के बैठना अच्छा भी होता है
कंही ऐसा भी होता है सदाक़त मार देती है
मुहब्बत में किसी से तुम तवाजुस
तुम नही करना
अगर यह हद से बड़ जाये तो इनायत मार देती है

वो मंज़िलें भी खो गई वो रास्ते भी खो गये
वो आशना से लोग थे वो अजनबी से हो गये
ना चाँद था ना चाँदनी अजीब थी वो जिंदगी
चिराग़ थे के बुझ गये नसीब थे कि सो गये
पूछते हैं रात भी रुके हो किस के वास्ते
चलो कि तुम भी अब चलो के वो मेहरबान खो गये
Wo manzlain bhi kho gai, Wo rasty bhi kho gaye, Jo aashna say loog thay, Wo
ajnabi say ho gaye. Na chand tha na chandni, Ajeeb thi wo zindagi, Chiragh
thy k bujh gaye, Naseeb thay k so gaye, Ye pochty hain rasty, Rukay ho kiss
k wastay. Chalo k tum bhi ab chalo, K Wo meharban b kho gaye..

Mujhe manzilon

मुझे मंज़िलों की खबर तो है मुझे रास्तों का पता नही
Jo मुझे दिखाती हैं रास्ते उन्हीं साअतो का पता नहीं
मगर ये उम्मीद की कश्तियाँ मुझे डूबने से बचा रही
कोई साथ साथ है चल रहा हैं ये आहटें हैं बता रहीों
वसरगोशियो में वे कह रहा तेरे हाथ में मेरा हाथ है
सभी ग़म के दरिया अबूर कर मेरी हर नज़र तेरे साथ है

Munh zabani na batata ke muhabbat kya hai

Munह zabani na batata ke muhabbat kya hai
मुँह ज़बानी ना बताता के मुहबत कया है मैं तुझे कर के दिखाता के मुहबत कया है
कैसे सीने से लगाऊँ के किसी और के हो मेरे होते तो बताता के मुहबत कया है
ख़ूब समझाता तुझे तेरी मिसालें दे कर काश तू पुछने आता के मुहबत कया है

Na gayi

ायंयना गई वो दिल से सयाहाई ना जबीं से रंग जुदा हुआ
ना खुशी की तसबीह कहीं मिली, ना ग़मों के सजदे आता हुऐ
ख़िज़ाँ ने आके जो पेड़ से किये थे वादे बहार के
ना वो पेड़ फिर से हरा हुआ ना वादों से वह वफ़ा हुई

Miyan gaye vo zamane ab yeh himakat kaun karta hai
Is zamane mein mohabbat kaun karta hai
Kaii gham se pareshan hai koi jannat ka talib hai
garz sijee karatee hai ibadat kaun karta hai
मियाँ गये वो जमानें अब यह हिमाक़त कौन करता है
इस जंमाने में मुहब्बत कौन करता है
कई ग़म से परेशान हैं कोई जनत का तालिब है
गरज के सिजते करते हैं इबादत कौन करता है

Na hona be muravat na berukhi dikhana

Bas saadgi se kahna tum bojh ban gaye ho

Nafrat

नफरतो के देखो जानवरो का बटवारा हो गया
गाय हिंदू हो गई और बकरा मुसलमान हो गया
यं पेड ये पते यह शाखे भी परेशान हो जांये
अगर ये भी हिंदू और मुसलमान हो जाये
सूखे मेवे भी यह देख कर हैंरान हो गये
जाने कब नारियल हिंदू और खजूर मुसलमान हो गये
जिस तरह धरम मजहप के नाम पर हम अब रंगो को भी बांटते जा रहे हैं कि लाल हिंदू
और हरा मुसलमान हो गये हैं
तो वो दिन दूर नहीं के सब हरी सबजिया मुसलमानो की हो जायेंगी और हिंदूऔ के
हिसे मे गाजर और टमाटर ही रह जांयेगे
यह समझ नही आ रहा की तरबूज किसके
हिसे में जायेगा यह तो अनदर से हिंदू और बाहर से मुसलमान हो जायेगा

Nasle ishq psychology

कया खुदा ने मनदिंर तोडा था या राम ने मसजिद तोडी है
बाट दिया इस धरती को कया चांद सितारो का होगा
नदियो केकुछ नाम रहे पर बहती धारो का कया हेगा
शिव की गंगा भी पानी है आबे जमं जमं भी पानी है
मुललहा भी पिये पडिंत भी पिये पानी का मजहब कया हेगा
फिरकापरसतो से पूछो कया सूरज अलग बनाओगे
और एक हवा मे सांस है सब की कया हवा भी नई चलाओगे

Psychology ppपढनी चा हि थी मुझे
फिर मैं मिनटो में उनके चेहरे पढ लेती
नजरे पहचान लेती उनके ईरादो का पता चल जाता
और शायद यह भी कि उनके दिल में कौन सी बाते छुपी है
फिर तो बहुत दुख होता तुमे
तुम लौगो के चेहरे किसी को जान लेना बहुत बडा अजाब होता है
चेहरे पढ लोगी तो दोसतिया टूट जांयगी
नजरे पहचानोगी तो लोगो से घिन आनी शूरू हो जायगी
यह तो जानने की कोशिश भी ना करना
कि कौन कौन सी बात लोग दिल में छुपाये हुंए हैं
यह तो खुदा का हैसला कि सब कुछ जानता है और फिर भी खामोश है
किसी को जान लेना बहुत बडा अजाब होता है
चेहरे पढ लोगी तो दोसतिया टूट जांयगी
नजरे पहचानोगी तो लोगो से घिन आनी शूरू हो जायगी

ल को ना दि अपने नहींजब कोई इशक में हारा होगा टूटू एक सितारा होगा
शिरक में माफी मिलने लगी तो तुम से इशक दुबारा होगा
उसने मुड कर फिर देखा है पिछला करज उतारा होगा
यह तो घर की बात है उसने दिल को जांन से मारा होगा
तेरी आंख समनदर होगी मेरा जंरफ किनारा होगां

झूटो के बीच में सच बोल बैठा
वो नमक का शहर था और मैं अपने जंखम खोल बैछा

ना मुहबबत ना दोसती के
वकत रूकता नहीं किसी के लिये
अपने दिल को ना दुख दे यूं ही
ईस जमाने की बेरूखी के लिये
वकत के साथ साथ चलता रहे
यही बहतर है आदमी के लिये

Nazar

वो नजर से दूर तो हैं मगर यह अजीब सूरते हाल हैं
हर वकत पेशे नजर भी हैं न फिराक है ना विसाल हैं
और तेरे मशवरे खूलूस पर मुझे तरके इशक कबूल है
मगर एक बात है हमनशीं मेरी जिनदगी का सवाल है

दोसतों के साथ चलने में भी खतरे है हजा्र
भूल जाता हूं हमेशा मैं सभंल जाने के बाद
अब जरा सा फासला रख कर जलाता हूं यिराग
तजुरबा यह हाथ आया हात जल जाने के बाद

New ones

ख़ुशी जल्दी में थी रूकी नहीं ग़म फ़ुरसत में थे ठहर गये
लोगों की नज़रों में फ़र्क़ अब भी नहीं है, पहले मुड़ कर देखते थे अब देख के
मुड़ जाते हैं
आज परछाई से पुँछ लिया मैंने कयूं चलती है तू मेरे साथ
उसने हंस कर कहा और कौन है तेरे साथ बाक़ी सब तो छोड़ कर चले गएp?

New year

Ae naye saal bata tujh mein naya kya hai?
Har taraf khalq ne kyon shor macha rakkha hai?

Roshni din ki wahi, Taaron bhari raat wahi,
Aasman badla hai na badli ye afsurda zameen,

Ek Hindse ka badalna koi jiddat toh nahin,
Pichchle barson ki tarah honge kareene tere,
Kise maloom nahin barah mahine tere?

Besabab dete hain kyon log mubarakbaadein?
Ghaliban bhool gaye waqt ki kadvi baatein?

Tu naya hai to dikha subah nayi, shaam nayi,
Varna in aankhon ne dekhe hain naye saal kayi......

ZazzXZzzzz xzzzzzxxx C. C. Bb.

Faiz
aaz
(Khalq-crowd
Afsurda- pale
Hindse - numeral
Jiddat - new

Pas-e-Aaina

مینو

tujhe kyā ḳhabar mire be-ḳhabar mirā silsila koī aur hai

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tujhe kyā ḳhabar mire be-ḳhabar mirā silsila koī aur hai
jo mujhī ko mujh se baham kare vo gurez-pā koī aur hai
mire mausamoñ ke bhī taur the mire barg-o-bār hī aur the
magar ab ravish hai alag koī magar ab havā koī aur hai
yahī shahr shahr-e-qarār hai to dil-e-shikasta kī ḳhair ho
mirī aas hai kisī aur se mujhe pūchhtā koī aur hai
ye vo mājrā-e-firāq hai jo mohabbatoñ se na khul sakā
ki mohabbatoñ hī ke darmiyāñ sabab-e-jafā koī aur hai
haiñ mohabbatoñ kī amānateñ yahī hijrateñ yahī qurbateñ
diye bām-o-dar kisī aur ne to rahā basā koī aur hai
ye fazā ke rañg khule khule isī pesh-o-pas ke haiñ silsile
abhī ḳhush-navā koī aur thā abhī par-kushā koī aur hai
dil-e-zūd-ranj na kar gila kisī garm o sard raqīb kā
ruḳh-e-nā-sazā to hai rū-ba-rū pas-e-nā-sazā koī aur hai
bahut aa.e hamdam o chāra-gar jo numūd-o-nām ke ho ga.e
jo zavāl-e-ġham uh kā bhī ġham kare vo ḳhush-āshnā koī aur hai
ye ‘nasīr’ shām-e-supurdagī kī udaas udaas sī raushnī
ba-kanār-e-gul zarā dekhnā ye tumhi ho yā koī aur hai
Naseer Turab

———

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hum ne har dukh ko mohabat ka tasalsul samjha..
hum koi tum they k dunya se shikayat karte..

ham ne sokhi hui shakhon pe lahu chirka tha..
phool agar ab b na khilte to khasara karte..

hum agar chup hain to is ko b ganimat jano..
hum agar sabar na kartay to qayamat kartay..

hum ko mal0om hai dushman k sabhi thikan0 ka pata..
shareek e jurm na hotay to mokhbari kartay..

ki muhabat to siyasat kay chalan chor diye..
hum agar ishq na karte to hukumat karte..

———
Mohabbat Aag Hai To Phir Merii Rug Rug Mein Bharkii Hai Meri Aankhien Hain
Eik Shola Meri Saansien Hain Eik Agan Alaao Teri Yaadon Ka Meray Dil Mein
Kahien Roshan Mujhey Ab Fikr Hai Koii Na Koii Gharz Hai Is Sey K Teri Yaad
Mein Shab Bhar Wafa Ka Naam Ley Ley Kar Khien Hum Khud Hii Jaltay Hain Ya
Key Deep Jaltay Hain
Mohabbat Yaad Hai To Phir Meray Dil Mein Hai Yon Raksaan K Hum Ko Fikr Hai
Koii Na Hii Hosh Hai Baaqi Faqt Eik Yaad Hai Baaqii Jo Dil Kii Baanjh
Dhartii Par Ashkon Key Sang Baras Jaaye To Phir Barsat Kii Ley Mein Kahien
Eik Phool Khilta Hai Hum Us Phool Kii Khusboo Tumharay Naam Kartay Hain
Tumhari Yaad Mein Aksar Subah Se Shaam Kartay Hain
———-/——

مینو

khuda shahid hai sub kuch hoga laikiN hum naheeN hongey

1 Votes

Jo tum aao’ge phir aankhoN k darya num naheeN hongey khuda shahid hai sub
kuch hoga laikiN hum naheeN hongey
yaqeen jano tumhari qurbataiN bhi hashr dhayen gee K armanoN k aanga’rey to
hargiz kam naheeN hongey
ghamoN ki ta’an tootay gee na ubhray gee na phayle gee ye hai
saaz-e-mohabat is mein zer-o-bum naheeN hongey
tumhari yaad se khelaingey tanhai ki mehfil meiN wohi urtey huwe lamhey jo
sirf-e-ram naheeN hongey
mera maslak khuloos-e-ishq ka mafhoom rakhta hai mere sagar mein sub kuch
hoga laikin suman m naheeN hongey
wafa ne ek hayat-e-mustaqil hum ko aata ki hai k hum zinda raheinge garche
baqi dum naheeN hongey

———

Adhoray khwabon K khasta kagaz, sanbhal rkhna,hisab hoga…
Wafa K rishtay jafa ki rut main, bahal rkhna, hisab hoga
Sunehray jazbon ki qadar karna, rafaqaton main waqar rkhna…
Andher nagri main dil jala K, khayal rkhna, hisab hoga…
Muhbaton K safeer ban kar, jo chahaton K naqeeb ban’na…
Rah-e-wafa main na tum kisi se, malal rkhna, hisab hoga…
Zamane bhr ki ye talkhiyan Q? ye jabar kesa? ye sabr kasa?…
Meray liye tum bus apne lub pe, sawal rakhna, hisab hoga…

tum apni subh’ha kay rang likha kay apni raton kay khuwab likhna
bas itna karna jahan bhi rehna , meray khaton kay jawab likhna
phir itni fursat kisay milay gi k mill kay bethein tu hal pochein
magar khatooN mein har ek wa’aday , har ik qasam ka hisab likhna
mujhay tu Qareeb reh kar bhi kher jo jo azziyatein dein
tum ab judae kay mausam uthana jo jo azaab likhna
teri pareshanion ki khabrein yeh dukhti ankhein na parh skein gi
badan mein kantay bhi chubh rahay hon harf magar gulab likhna
hazar batein hein chaar ratein hein uss say kia kia kaho gay girl KHAWAR
wo chehra parh parh kay yad kar lo wo ja chukay tu kitab likhna
Ayub Khawar

Poochnay Walay Tujhey Kaisay Bataaein Akhir

पुछने वाले तुझे कैसे बताये आख़िर
दुख इबारत तो नही जो तुझे लिख कर भेजें
Dukh Ibarat To Nahi Jo Tujhey Likh Ker Bhaijein
Ye Kahani Bhi Nahi Hai K Sunaein Tujh ko
यहकहानी भी नही है
के सुनाये तुझको
ना कोई बात है ऐसी के बताये तुझको na Ko Koi Baat Hi Aisee K Bataein Tujh
Konana
Zakham Gar Ho To Teray Naakhun K Hawalay Ker Dein।
ज़ख़्म गर हो तो तेरे नाखुंन के हवाले कर दे
Aaina Bhi To Nahi K Dikhaein Tujh Ko
आइना भी तो नहीं के दिखाये तुझको
तुने पुछा है मगर कैसे बताये तुझको
Tu Ne Poocha Hai Magar Kaisay Bataein Tujh Ko
यह कोई राजं नहीं जिस को छिपाये तो वो राज
Ye Koi Raaz Nahi Jis Ko Chupaen To Wo Raaz
कभी चेहरे कभी आँखों से छलक जाता है
Kabhi Chehray Kabhi Aankhon Se Chalak Jata Hai
Jaisay Aanchal Ko Sambhalay Koi Aur Teiz Hawa
जैसा आँचल को संभाले कोई अौर कोई तेजं हवा
जब भी चलती है तो शाने से डलक जाता है
Jab Bhi Chalti Hai To Shaano Se Dhalak Jata Hai
अब तुझे कैसे बताये के हमें क्या दुख है
Ab Tujhey Kaisay Bataein K Humein Kia Dukh Hai
जिस्म में रेंगती रहती है मुसाफ़त की चटकने्
Jism Mai Reengti Rehti Hai Musafat Ki chThakan
फिर भी काँधे पे उठाये हुऐ हालात का बोझ
Phir Bhi Kaandhon Pe Uthayae Huwe Halat Ka Bojh
अपने क़दमों से हटायें हुए साया अपना
Apnay Qadmon Se Hatatay Huwe Saya Apna
जिस को भी देखिये चुप चाप चला जाता है
is Ko Bhi Dekhiye Chup Chap Chala Jata Hai
Kabhi Khud Se Kabhi Raston Se Ulajhta Hai Magar
कभी ख़ुद से कभी रसतो से उलझता है मगर
जानेवाला किसी आवाजं पे रुकता ही नहीं
Wala Kisi Awaz Pe Rukta Hi Nahi
ढूडनाहै नया पेराया इ इजंहार हमें
Dhoondna Hai Naya Peraya-E-Izhar Humein
सितारो की ज़ुबान कोई समझता ही नही tiaron Ki Zaban Koi Samajhta Hi Nahi
Dil Grifta Hain Talismat-E-Gham-E-HastiSe
Saans Lenay Se Fusoon Kariy-E-Jaan Tootti Hai
Ik Taghayyur Pas-E-Her Shay Hai Magar Zulm Ki Dor
Abhi Maloom Nahi Hai K Kahan Tooti Hai
Tu Samajhta Hai K Khushboo Se Moattar Hai Hayat
Tu Ne Chakha Hi Nahi Zeher Kisi Mausam Ka
Tujh Pe Guzra Hi Nahi Raqs-E-Junoon Ka Aalam
Aisa Aalam Jahan Sadiyoun K Tahhayur Ka Nasha
Her Bicharti Huwi Sa’at Se Galay Milta Hai
Is Tamashay Ka Bazahir To Nahi Koi Sabab
Sirf Mehsoos Kero Gay To Pata Chalta Hai
Aik Dhun Hai Jo Sunayee Nahi Deti Phir Bhi
Lay Ba Lay Berhata Chala Jata Hai Hungam-E-Sitam
Koo Ba Koo Phailta Jata Hai Gubaar-E-Man-O-Tu
Rooh Se Khali Huwe Jatay Hai Jimson K Haram
Waqt Be Rehm Hai,Hum Raqs-E-Barehna Hain Sabhi
Ab To Paband-E-Salasil Nahi Koi Phir Bhi
Dasht-E-Mishghaan Mai Bhatakta Huwa Taron Ka Hujoom
Safha-E-Lab Pe Sisiskti Huwi Awaz Ki Lo
Dekh To Kaisay Rehayee Ki Khabar Kerti Hai
Rozan-E-Waqt Se Aghaaz-E-Safer Kerti Hai
Be Khabar Rehna Kisi Baat Se Acha Hi Nahi
Tu Kabhi Waqt Ki Dehleez Pe Tehra Hi Nahi
Tu Ne Dekhay Hi Nahi Halqa-E-Amroz K Rang
Garmiye Wada-E-Ferda Se Pighaltay Huwe Log
Apnay Hi Khuwab Ki Tabeer Mai Jaltay Huwe Log
Bhook Aur Piyas Ki Mari Huwi Faslon Ki Terah
Barr-E-Azam Ki Lakeeron Se Ubhartay Huwe Log
Amn K Naam Per Barood Bhari Dunniya Mai
Khas-O-Khashak Ki Manind Bhikertay Huwe Log
Roz Jeetay Huwe Aur Roz Hi Mertay Huwe Log
Zindagi FILM Nahi Hai K Dikhaen Tujh Ko
Tu Ne Poocha Hai Magar Kaisay Bataein Tujh Ko
Koi Mehfooz Nahi Ahl-E-Tahafuz Se Yahan
Raat Bhari Hai Kahin Aur Kahin Din Bhari
Saari Dunniya Koi Medan Sa Lagti Hai Humein
Jis Mai Ik Maarka-E-Sood-O-Ziyan Jari Hai
Paon Rakhay Huwe Barood Per Sab Log Jahan
Apnay Hathon Mai Uthaye Huwe Perwana-E-Shab
Aasteenon Mai Chupaey Huwe Mehtaab Koi
Apni Gerdan Mai Liay Apnay Gareeban Ka Tauq
Neend Mai Chaltay Huwe Dekhtay Hai Khawab Koi
Aur Ye Sochtay Rehtay Hai K Deewaron Se
Shab K Aasaar Dhalay,Subh Ka Sooraj Ubhra
Door Ufaq Paar Paharon Pe Chamakti Huwi Berf
Naye Sooraj Ki Tamazat Se Pighal Jaey Gi
Aur Kisi Waqfa-E-Imakaan-E-Sehar Mai Ab K
Roshni Saaray Anndheron Ko Nigal Jaey Gi
Dekhiye Kaisay Pohanchti Hai Thikanay Pe Kahin
Door Ik Faakhta Urti Hai Nishanay Pe Kahin
Aa Ke Ye Manzir-E- Khoon Basta Dikhayen Tujh Ko
Tu Ne Poocha Hai Magar Kaisay Baataein Tujh Ko
Koi Gaahak Hi Nahi Johar-E-Aainda Ka
Chashm Kholay Huwe Baithi Hai Dukan-E-Girya
Aur Isi Manzar-E-Khoon Basta Ka Goshay Mai Kahin
Ser Pe Dalay Huwe Ik Lamha-E-Maujood Ki Dhool
Teray Usshaq Bohat Khaak Basar Phirtay Hain
Waqt Kab Khainch Ley Maqtal Mai Gawahi K Liay
Dast-E-Khali Mai Liay Kasa-E-Sir Phirtay Hain
Poochnay Walay Tujhey Kaisay Bataaein Akhir
Dukh Ibarat To Nahi Jo Tujhey Likh Ker Bhaijen
Dukh To Mehsoos Huwa Kerta Hai
Chahay Tera Ho Ya Mera Dukh Ho
Admi Wo Hai Jisay Jeetay Jee
Sirf Apna Nahi Sab Ka Dukh Ho
Chak Ho Jaey Jo Ik Baar Hawas K Hathon
Jama-E-Ishq Doobara To Nahi Silta Hai
Asman Meri Zameenon Per Jhuka Hai Lakin
Tera Aur Mera Sitara Hi Nahi Milta Hai

पुछने वाले तुझे कैसे बताये आख़िर
दुख इबारत तो नही जो तुझे लिख कर भेजें
यह कहानी भी नही है
के सुनाये तुझको
ना कोई बात है ऐसी के बतायेतुझको
पुछने वाले तुझे कैसे बताये आख़िर
ज़ख़्म गर हो तो तेरे नाखुंन के हवाले कर दे

आइना भी तो नहीं के दिखाये तुझको
तुने पुछा है मगर कैसे बताये तुझको

यह कोई राजं नहीं जिस को छिपाये तो वो राज
कभी चेहरे कभी आँखों से छलक जाता है

जैसेआँचल को संभाले कोई अौर कोई तेजं हवा
जब भी चलती है तो शाने से डलक जाता है

अब तुझे कैसे बताये के हमें क्या दुख है

जिस्म में रेंगती रहती है मुसाफ़त की चटकने
फिर भी काँधे पे उठाये हुऐ हालात का बोझ

अपने क़दमों से हटायें हुए साया अपना
जिस को भी देखिये चुप चाप चला जाता है

कभी ख़ुद से कभी रसतो से उलझता है मगर
जानेवाला किसी आवाजं पे रुकता ही नही
ढूडना है नया पेराया इ इजंहार हमें
सितारो की ज़ुबान कोई समझता ही नही
दिल गिरफ़्तार है तिलसमाने-ए-गमे-हसती से
साँस लेने से फूसुं कारिये-ए-जाँ टूटी है
इक तगहयुर पसे-हर शय ज़ुल्म की ढोर
अभी मालूम नही है कि कहा टूटी है
तु समझता है कि ख़ुशबुओं से मुअतर है हयात
तुने चखा ही नही ज़हर किसी मौसम का
तुझ पे गुज़रा ही नही रखसे-जुनु- का आलम
एसा आलम जहा सदियों का तहायुर का नशा
हर बिगड़ती हुई साअत से गले मिलता है
इस तमाशे का बजाहिर तो नही कोई सबब
सिर्फ़ महसूस करोगे तो पता चलता है
एक धुन है जो सुनाई नही देती फिर भी
ले-बाँ-ले बड़ता चला जाता है हगाम-ए-सितम
कूँ-बाँ-कूँ फैलता जाता है ग़ुब्बारे-ए-मैं-ओ-तु
रूह से ख़ाली हुए जाते है जिमसो के हरम
वक़्त बेरहम है, हम रखस-ए-बरेहना हे सभी
अब तो पाबंद-ए-सलासिल नही कोई फिर भी
दशक-ए-मिशगां में भटकाता हुआ तारो का हुजुम
सफआ-लब पे सिसकी हुई आवाज़ की लौ
देख तो कैसे रिहाई की ख़बर करती है
रोज़ -वक़्त से आग़ाज़-ए-सफ़र करती है
बे ख़बर रहना किसी बात से अच्छा ही नही
तु कभी वक़्त की दहलीज़ पर ठहरा ही नही
तुने देखा ही नही हल्का-ए-अमरोज का रगं
गरमिये वादा-ए-फरदा से पिघलते हुए लोग
अपने ही ख़्वाब की तामीर में जलते हुए लोग
भूख और प्यास की मारी हुई फ़सलो की तरह
बारे-ए-आजम की लकीरों से उबरते हुए लोग
अमन के नाम पे बारूद भरी दुनिया में
ख़ास-ओ-खाशाक की मानिदं बिखरते हुए लोग
रोज़ ही जीते हुए और रोज़ ही मरते हुए लोग
ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है जो दिखाये तुझ को
तुने पुछा है मगर कैसे बताये तुझ को
कोई महफ़ूज़ नही अहल-ए-तहाफुजं से यहाँ
रात भारी है कही और कहीं दिन भारी
सारी दुनिया कोई मैदान सा लगता है हमें
जिसमें ईक मक्का-ए-सूद-ओ-जियां जा्री है
पाव रखते हुऐ बारूद पर सब लोग जहाँ
अपने हाथो में ऊठाये हुए परवाना-ए-शब
आस्तीनों में छिपाये हुए महताब कोई
अपनी गरदन में लिये अपने गरेबान का तअोक
नींद में चलते हुए देखते है ख़्वाब कोई
और यह सोचते रहते है दीवारों से
शब का आसार ढले, सुबह का सूरज उभरा
दूर ऊफआक पर पहरों से चमकती हुई बर्फ़
नये सुरज की तमाजांत से पिघल जाएगी
और किसी वकफा-ए-इमकान-ए-सहर में अब के
रोशनी सारे अंधेरों की निगल जायेगी
देखिये कैसे पहुँचातीं है ठिकाने पे कहीं
दूर ईक फाँकता ऊडती है निशाने पे कहीं
आ के ये मनजरे-ए-खुं बसता दिखाये तुझ को
तु ने पुछा है मगर कैसे बताये तुझको
कोई गाहक ही नही जौहर-ए-आइन्दा का
चशम खोले हुए बैठी है धुकन-ए-गिरियाँ
और इस मनजर-ए-खुं बसता का गोशे में
सर पे डाले हुए इक लमहा-ए-मौजूद की धूल
तेरे ऊशआक बहुत ख़ाक बसर मिलते है
वक़्त कब खेंनच ले मक़तल में गवाही के लिये
दस्ते-ए-ख़ाली में लिये काँसा-ए-सर फिरते हैं
पुछने वाले तुझे कैसे बताये आख़िर
दुख इबारत तो नही है जो तुझे लिख कर भेजें
दुख तो महसुस हुआ करता है
चाहे तेरा हो या मेरा दुख हो
आदमी वो है जिसे जीते जी
सिर्फ़ अपना नही सब का दुख हो
चाक हो जाये जो इक बार हवस के हाथों
जामा-ए-इश्क़ दोबारा तो नही मिलता है
आसमान मेरी ज्मीनो पर झुका है लेकिन
तेरा और मेरा सितारा ही नही मिलता है
तुने पुछा है मगर कैसे बताये तुझको
अब तुझे कैसे बताये के हमें क्या दुख है

Ye Ghazal Hai Na Geet Hai Koi

Ye Mere Dard Ki Kahani Hai
Mere Seene Me Sirf, Ho
Mere Seene Me Sirf Shole Hai
Meri Aankhon Me Sirf Pani Hai
Kabhi Bekasi Ne Mara, Kabhi Bebasi Ne Mara, Kabhi Bekasi Ne Mara

Gila Maut Se Nahi Hai, Gila Maut Se Nahi Hai
Mujhe Zindagi Ne Mara
Kabhi Bekasi Ne Mara Oh, Kabhi Bebasi Ne Mara
Muqaddar Pe Kuchh Jor Chalta Nahi
Wo Mausam Hai Ye Jo Badalta Nahi

Kahin Thi Ye Badnaseebi Oh, Kahin Thi Meri Garibi
Oh, Kahi Thi Meri Garibi
Kis Kis Ka Naam Loon Main Oh, Kis Kis Ka Naam Loon Main
Mujhe Har Kisi Ne Maara
Gila Maut Se Nahi Hai, Gila Maut Se Nahi Hai
Mujhe Zindagi Ne Mara
Kabhi Bekasi Ne Mara Oh, Kabhi Bebasi Ne Mara
Bemurawwat Bewafa Duniya Hai Ye
Hai Yahi Duniya To Kya Duniya Hai ye
Na Kami Thi Dosto Ki, Na Kami Thi Dushmano Ki
Oh, Na Kami Thi Dushmano Ki
Kahin Dushmani Ne Luta, Kahin Dushmani Ne Luta
Kahin Dosti Ne Mara
Gila Maut Se Nahi Hai, Gila Maut Se Nahi Hai
Mujhe Zindagi Ne Mara
Kabhi Bekasi Ne Mara, Kabhi Bebasi Ne Mara
Source: LyricFind
Songwriters: R.D. Burman
Kabhi Bekasi Ne Mara lyrics © T-Series

Yeh Jo Zindagi Ki Kitaab Hai

amnad Sirajudeen on Sunday, August 31, 2014
ये जो जिंदगी की किताब हैं, ये किताब भी क्या किताब हैं
कही एक हसीन सा ख्वाब हैं, कही जानलेवा अज़ाब हैं

कही छाँव हैं... कही धुप हैं ... कही और ही कोई रूप हैं
कई चेहरे इसमें छुपे हुये, एक अजीब सी ये नकाब हैं

कही खो दिया कही पा लिया, कही रो लिया कही गा लिया
कही छीन लेती हैं हर खुशी, कही मेहरबान बेहिसाब हैं

कही आसुओं की हैं दास्तान, कही मुस्कुराहटों का बयां
कही बरकतों की हैं बारिशें, कही तिश्नगी बेहिसाब हैं

अपने खालीपन को भरना छोड दिया

तनहाई से बिलकुल डरना छोड दिया
अब तो मुझको मेरे हाल में जीने दो
अब तो मैने तुम पर मरना छोड दिया
तुमको हिचकी आने से भी दिकत थी
मैने तुमको याद ही करना छोड दिया

ऐ दिल पहले भी तनहा थे

ऐ दिल हम तो तनहा आज भी है
अब उन जखमो से और दागो से अपनी बातें होती हैं

इस तरह से कब तक जीना है मैं हार गया इस जीने से

कोई जागता हो कोई उठ जाये मेरे देर से ववापिस आने पर
कोई सर जोडे मेरे कुंजन से कोई बरसे मेरे आगंन पर
कोई सांस भरे मेरे पहलू में कोई हाथ रखे मेरे कांधे पर
और दबे दबे लहहजें मे कहें तूने बहुत। लगे
तुमने बहुत ही दरद सहे

कया कया हमारे खवाब थे जाने कहा पे खो गये

तुम भी किसी के साथ हो हम भी किसी के हो गयें
एक पल भी जिनके बगैर जीना भी मुहाल था
शकले भी उन कि बुझ गईं नाम भी उनके खो गये
आंखौं को दे के रत जगे रसतो को दे के दूरिया
अमजद वो अपने हमसफर कैसे मजें में सो गये
◦

चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन

क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन

राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब
दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन

पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूँ
बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन

ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरी दिल की गली से
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन

गुज़रें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे
इस तरह मिरी रात को चमकाओ किसी दिन

मैं अपनी हर इक साँस उसी रात को दे दूँ
सर रख के मिरे सीने पे सो जाओ किसी दिन
.
.....अमजद इस्लाम अमजद

यह वकत की फितरत है माहैल बदल देगा

खुशियो ने जो छेड् है तो दुख भी चल। जायेगें

हमने सहना सीख लिया है

कुछ ना कहना सीख लिया
बात करे तो बात बडेगी
इस लिये चुप रहना सीख लिया है
कभी कभी इनसान ना टूटता है ना बिखरता है
वो बस हार जाता है कभी खुद से कभी किसमत से और कभी अपनो से