Veena's Musings

Poets

Verses gathered under the names of the poets who wrote them. 29 pieces

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Ahmad Faraz

इस से पहले के हम बे वफा हो जाये
कयूं नाऐ ददोसत हम जुदा हो जाये
तू हीरे से पतथर बन गया
हम भी कल कया से कया हो जाये
हमने बनदगी छोड दी ऐ दोसत
कया करे जब लोग खुदा हो जाये
बहुत सताया तूने जिंदगी
सता ले जितना सताना है जिंंदगी
हमने यह कौन सा रोज रोज आना है

Ahmad Rahi - Dost Mayus Na Ho

Dost Manaus na ho
Ahmad rahi
Gam गुसारी
दोस्त मायूस ना हो
सिलसिले बनते बिगड़ते ही रहे हैं आख़िर
तेरी पलकों पे सर अशकों के सितारे कैसे
तुझको हम है तेरी महबूब तुझे मिल ना सकी
और जो जींसत सँवारीं थी तेरे ख़्वाबों ने
वो इन्हीं ठोस हकयाहक में कहीं टूट गई
तुझ को मालूम है मैंने भी मुहब्बत की थी
और अंजामें मुहब्बत भी है मालूम तुझे
अनगिनत लोग जमांने में रहे हैं नाकाम
तेरी नाकामी नई बात नहीं दोस्त मेरे
किसने पाई है भला जीसत की तल्ख़ी से नजात
चारों नाचार यह जहराब सभी पीते है
जाँ सपारी के फरेबिनदा फ़सानों पे न जा
कौन मरता है मुहब्बत में सभी जीते है
वक़्त हर ज़ख़्म हर ग़म को भुला देता है
वक़्त के साथ यह सदमा भी गुज़र जायेगा
और येह बातें जो दोराही है मैंने इस वक़्त
तु भी इक रोज़ इन्हीं बातों को दोहरायेगा
दोस्त मायूस ना हो

Akhtar Shumar

Uske nazdik gham-e-tark-e-wafa kuchh bhi nahin

उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं -
उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं 
मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं 

अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं 
उस को खो कर तो मिरे पास रहा कुछ भी नहीं 

चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी 
उस ने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं 

kकल बिछड़ना है तो फिर अहद-ए-वफ़ा सोच के बाँध 
अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं 

मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने I
तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं 

ऐ 'शुमार' आँखें इसी तरह बिछाए रखना 
जाने किस वक़्त वो आ जाए पता कुछ भी नही

Altaf Hussain Hali

#WordOfTheDay
रंज और रंज भी तन्हाई का
वक़्त पहुँचा मिरी रुस्वाई का
~अल्ताफ़ हुसैन hali

Jawaab talkh mila hai to ranj kyun hai,
Mizaaj dekh kar Izhaar-e-aarjoo karte.

जवाब तल्ख़ मिला है तो रजं कयू है
मिजाजं देख कर इज़हारे आरजूं करते

Arpit - Ab Dil Bujha Bujha Hai

Poet: Arpit (pen name, signed in the ghazal's closing couplet)

Ab Dil Bujha Bujha Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Jeene Me Kya Rakhaa Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Dil Ke Maraz Ka Ab Nahin Duniya Me Kuch ilaaj,
Ye Ishq La Dava Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Main Be-Gunaah Hun To Yahi Haii Meri Sazaa,
Ye Faishla Hua Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Darta Hun Aaine Ko Lagane Se Hath Main,
Kahta Ye Aaina Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Main Hun Wafa Shiaar Yahan Jee Ke Kya Karun,
Ye Dour-E-Bewfa Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Wallah Be Nasha Na Rahi Meri Koi Sham,
Ukhda Hua Nasha Haii , Mujhe Maar Diijiye,,
E Jane Dil Bahar Teri Berukhi Ke Baad,
Ab Mere Pass Kya Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Tanhaiyon Ki Qaid Se Ghabra Ke Ek Shakhs,
Aawaz De Raha Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Ek Baat Josh-Josh Me Sach Kah Gaya Hun Main,
Tumko Bura Laga Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Tanhaii Meri Usse Bhi Dekhi Nhin Gayi,
Usne Bhi Ye Kaha Haii , Mujhe Maar Dijiye,,
Rashke Chaman Bana Haii Ye "Arpit" Mera Wajood,
Khushbu Ko Chuu Liya Haii , Mujhe Maar...

अब दिल बुझा बुझा है, मुझे मार दीजिए,,
जीने में क्या रखा है, मुझे मार दीजिए,,
दिल के मरज़ का अब नहीं दुनिया में कुछ इलाज,
ये इश्क़ ला दवा है , मुझे मार दीजिए,,
मैं बे-गुनाह हूँ तो यही है मेरी सज़ा,
ये फ़ैसला हुआ है , मुझे मार दीजि...

Bashir Badr

कभी तो आसमाँ से चांद उतरे जाम हो जाये तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो
जाये
हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो
जाये
अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो
जाये
समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम
हो जाये
मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ कोई मासूम क्यों मेरे लिये
बदनाम हो जाये

मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो
जाये
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो
जाये

अभी इस तरफ ना निगाह कर मैं गजल की जूलंफे सवांर लू
रा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूं

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूं

अगर आसमां की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम हो
तो मैं मोतियों की दुकान से तिरी बालियां तिरे हार लूं

कहीं और बांट दे शोहरतें कहीं और बख़्श दे इज़्ज़तें
मिरे पास है मिरा आईना मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूं

कई अजनबी तिरी राह में मिरे पास से यूं गुज़र गए
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तिरा नाम ले के पुकार लूं

वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए, युँ ही रास्ते में जुदा हुए
ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं, ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं
वो तेरा हैं, उसको गले लगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो ग़ज़ल की कोई किताब था , वो गुलों में एक गुलाब था
ज़रा देर का कोई ख़्वाब था, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ये सफ़र भी किताना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है
कहाँ लौट कर कोई आएगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

कोई फ़र्क शाह-ओ-गदा नहीं, कि यहाँ किसी को बक़ा नहीं
ये उजाड़ महलों की सुन सदा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया

Bulleh Shah

Bulle shah
हर खून विच। वफा नइ हुंनदी बुलया
नसल देख के यार बनाया कर
जहर देख के पीता ते की पीता
इशक सोच के कीता ते की कीता
दिल दे के लैन दी आस रखी
पयार वी लालच नाल कीता ते की कीता

उस यार नाल यारी कदी ना रखी
जीनू अपने ते गरूर होवे
मा बाप नू बुरा कदी ना आखीं चाऐ लख औनादा कूसूर होवे
राह चलदे नू दिल कदी ना देवीं
जिना वी औदे चेहरे ते नूर होवे
बुलया दोसती उथे करी जिथे दोसती निभावन दा दसतूर होवे

सची गल जो कह चांदे ने सुली टंगें रह जांनदे ने
टूटे शीशे फेर नई जुड़ते पत्थर नाल जो टैग जानदे ने
बुले वर्गा इश्क़ जे होवे पैरी गूगरू पै जाते ने
ऐसे लोग कदी नई मर्दों जो वीरां से जादे में

जीते यार हज़ार होवन उस यार नू यार ना समझी
जो हद तो ज़्यादा प्यार करे उस प्यार नू प्यार ना समझी
तूं जीदे लोई दिल हार बैठे ओस हार् नू हार ना समझी
यार चाएँ किनारी गरीब होवे ओदी संगत नू बेकार ना समझी

Na main pooja path jo keeti, Na main ganga nahayaan,
Na main panj namazan padhyian, Na main tazba khadkaya
Na main kiho rozey rakhen, Na main chillah ghumaya,
Bulleh Shah nu Murshad milya jinhe aiven hi ja bakshaya.

Je kuttaa dar-dar fire te dar-dar dur-dur hove,
je ik dar da ho rave ta kaanu dur-dur hove,,,

कागज उते अग ना रखी पागल दे सर पग ना रखी
बुले शाह दी मन लै सजना
मुलक दा राखा ठग ना रखी

Na mai pooja paath ja kiti na mai ganga naahya,,,
Na mai paanjj namaaza padiyaa te na mai tasba khadkaaya,,,

Na mai teeyo roze rakhe te na mai chilla punayaa,,,
Bulleh shah nu murshad mileya ohne aive eeii jaa bakhshaaya....

कल्चर

चढ़दे सूरज ढलदे देखे, बुझदे दीवे बलदे देखे – बुल्लेशाह

“चढ़दे सूरज ढलदे देखे
बुझदे दीवे बलदे देखे

हीरे दा कोइ मुल ना जाणे खोटे सिक्के चलदे देखे
जिना दा न जग ते कोई,
ओ वी पुतर पलदे देखे।

उसदी रहमत दे नाल बंदे पाणी उत्ते चलदे देखे!
लोकी कैंदे दाल नइ गलदी, मैं ते पथर गलदे देखे।
जिन्हा ने कदर ना कीती रब दी, हथ खाली ओ मलदे देखे …
कई पैरां तो नंगे फिरदे, सिर ते लभदे छावां,
मैनु दाता सब कुछ दित्ता, क्यों ना शुकर मनावां!”

जो-जो कल्पनीय है और जो-जो कल्पनातीत है जिसकी हम चेष्टा करते है वो पूर्व
में घटित हो चुका है । जहां तक हम पहुंचना चाह रहे है वहां पहले ही पहुंचा जा
चुका है- महर्षि अरविंद

(ढलदे=ढलते हुए, बलदे=जलते हुए, मुल=मुल्य, पलदे=पलते हुए, लौकी कैंदे=लोग
कहते है, नइ=नहीं, गलदी=गलना, कीती=करना, लभदे=ढूंढते, दित्ता= दिया,
शुकर=शुक्र )

परदा आंखो से हटाने में बहुत देर लगी
हमें दुनिया नजर आने में बहनत देव लगी is
नजर आता है जो वो होता नहीं हर शखस
खुद को यह बात समझाने में बहुत देर लगी

◦ वो बाते खा गई मुझको जो बाते पी। गया था मैं

मैनें कहा गुनहगार हू रब ने कहा माफ कर दूंगा
मैनें कहा परेशान हू रब ने कहा मैं संभाल लूंगा
मैंने कहा तनहां हू रब ने कहा तेरे साथ हूं मैं
मैनें कहा बहुत उदास हूं रब ने क meहा आंख उठा कर तो देख
मैं तेरे आस पास हूं
◦
तकदीर ने जैसे चाहा वैसे डल गये हम
बहुत सभंल कर चले पर फिसल गये हम
किसी ने भरोसा तोडा किसी ने दिल
पर लौगो को लगता है बहुत बदल गये हम

तू भी ना मिल सका हमें उमर भी रायगां गई
तुझ से खैर इशक था खुद से बडे गिले रहे

कलम से लिख नही सकते उदास दिल के अफसाने
हम तुमहे दिल से पयार करते हैं तुमहारे दिल की खुदा जाने

बढे वसूख से दुनिया फरेब देती रही
बढे खूलूस से हम एतबार करते रहे

जहा जिस का दाना रहता समय उस को वहा बुलाता है
कोई किसी का दिया नही खाता हर कोई अपने नसीब का खाता है

असी सादे दिल दे लौग हाॉ साडा दिल ना यार दुखाया कर
ना झुठे वादे करया कर ना झूठी कसमा खाया कर
किनी वारी मैं तैनू आखया है मैनु बार बार ना आजमाया कर
तेरी याद दे। विच मैं मर जावाॉं मैनू याद ना ईना आया कर

मेरे इशक दे विच माशूक ना हो
नहीं अज तक गलत निगाह कीती
तेरी हर मुलाकात मैं इजं किती
जिवा मूसा नाल खुदा कीती
नही फरक कीता तेरी पूजा विच
नही हतायी दी परवा कीती
ैनू र ब नही कह सकदीo
पर सारी रसम अदा कीती

Galway Kinnell - If One Day

Poet: Galway Kinnell

If one day it happens
you find yourself with someone you love
in a café at one end
of the Pont Mirabeau, at the zinc bar
where wine takes the shapes of upward opening glasses,

and if you commit then, as we did, the error
of thinking,
one day all this will only be memory,

learn to reach deeper
into the sorrows
to come—to touch
the almost imaginary bones
under the face, to hear under the laughter
the wind crying across the black stones

Kiss the mouth
that tells you, here,
here is the world. This mouth. This laughter. These temple bones.

The still undanced cadence of vanishing.

Gopal Das Neeraj - 1

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

किस-किस की नीयत सुधारोगे
किस-किस से लड़ के हारोगे
बदलो तुम, अब संभलो तुम
कब तक ख़ुद को मारोगे

शांत रहो और लोहा बनो
या फिर तप के सोना बनो
हाथो से अपनी नैया को
तुम ख़ुद ही पार उतारोगे

लाखों करोड़ों लोग यहाँ
अंदाज़ जुदा,है मिजाज़ जुदा
शक्ति मिलेगी मन को जब
सोचोगे और विचारोगे

ख़ामोशी आवाज़ है
ये भी एक अंदाज़ है
बढ़ोगे आगे चलोगे जब
बीती हुई को बिसारोगे

ग्रहण करो वो ही केवल
जो अपनाने के लायक है
जानोगे हर पल की कीमत
जब मन की धूल को झाड़ोगे
(स्वरचित एवं मौलिक )
डॉ वैशाली शर्मा

दोस्तों! मेरी एक पुरानी ग़ज़ल आपकी नज़र....

मेरे ख़ाबों से जब ख़ौफ़ खाने लगे।
अश्क आँखों से दामन छुड़ाने लगे।।

आदमी को बनाया ख़ुदा ने मगर।
आदमी अब ख़ुदा को बनाने लगे।।

मैने दो-चार सच ही उजागर किए।
तुम बरहना नज़र कैसे आने लगे।
(बरहना - बेलिबास, नंगा)

आप भी तो ग़ुनह में मेरे साथ थे।
आप क्यों मुझपे पत्थर उठाने लगे??

मुद्दतों दर पे दस्तक हुई ना कोई।
अपना दरवाज़ा खुद खटखटाने लगे।।

नाम को अर्श तक ना उठा पाए तो।
नाम लिख कर पतंगें उड़ाने लगे।।

वो जो दौलत विरासत में तुमको मिली।
उसको पाने में हमको ज़माने लगे।।

बादे - मुद्दत जो दर्पन में देखा ज़रा।
हमको अपने ही चहरे पुराने लगे।।
(बादे-मुद्दत - बहुत समय बाद)
विकास सक्सेना 'साहिल' बदायूँनी

Gopal Das Neeraj - 2

-गोपाल दास नीरज-

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उन का निकलना चाहिए

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

फूल बन कर जो जिया है वो यहां मसला गया
ज़ीस्त को फ़ौलाद के सांचे में ढलना चाहिए

छीनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आंख से आंसू नहीं शोला निकलना चाहिए

दिल जवां सपने जवां मौसम जवां शब भी जवां
तुझ को मुझ से इस समय सूने में मिलना चाहिए Veena

Gulzar - Collection

Poet: Gulzar
(this came from one large forwarded email containing many separate pieces pasted together over time, several repeated 2-3 times; duplicates removed and non-poem clutter - forward captions, a stray search-engine message - trimmed out. Split into individual pieces below.)

1. Chhod Diya Uska Intezaar

छोड दिया उसका इनतिंजार हमेशा के लिये
अगर रात बीत सकती है तो जिंदगी भी गुजर जायेगी

ईक नजम की सूई से सब ज़ख़्म हयाती के सीता हुआ गुज़रा हूँ
चुभती थी तो लगती थी जब पार निकलती थी जब टांका लग जाता था तो दर्द को
तसकीन से सीती हुई चलती थी
ईक गलती हुई मुझसे जिस धागे से सीता था उस धागे के आख़िर में मैं गिरह लगाना
भूल गया
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें
शम्अ जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें
वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने
चाँद का छिलका उतर जाए तो क़ाशें निकलें
दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है
कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं
दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें
ग़ार के मुँह पे रखा रहने दो संग-ए-ख़ुर्शीद
ग़ार में हाथ न डालो कहीं रातें निकलें

2. Aankhon Mein Jal Raha Hai

आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ
पलकों के ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ
कितनी उँडेलीं आँखें प बुझता नहीं धुआँ
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ
चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ
काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में
बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ
चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में
थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ

3. Aag Ho To Jalane Mein Der Kitni Lagti Hai

aag ho to jalane me.n der kitanii lagatii hai
barf ke pighalane me.n der kitanii lagatii hai
आग होतो जलने में देर कितनी लगती है
बर्फ के पीगलने में देर कितनी लगती है
चाहे कोई रुक जाये चाहे कोई रह जाये
क़ाफ़िलों को चलने में देर कितनी लगती है
मोंम का बदन ले कर धूप में निकल आना
और फिर पीगलने में देर कितनी लगती है
सोच की ज़मीनो में रास्ते जुदा हो तो
दूर जा निकलने में देर कितनी लगती है

4. Koi Atka Hua Hai Pal Shayad

कोई अटका हुआ है पल शायद
वक़्त में पड़ गया है बल शायद
लब पे आई मिरी ग़ज़ल शायद
वो अकेले हैं आज-कल शायद
दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इस का कोई नहीं है हल शायद
जानते हैं सवाब-ए-रहम-ओ-करम
उन से होता नहीं अमल शायद
आ रही है जो चाप क़दमों की
खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद
राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद
चाँद डूबे तो चाँद ही निकले
आप के पास होगा हल शायद

5. Na Chahat Ke Andaaz Alag

ना चाहत के अंदाज अलग
ना दिल के जजंबात अलग
है सारी बात लकीरों की
तेरे हाथ अलग मेरे हाथ अलग

इतना क्यूँ सिखाये जा रही है ज़िन्दगी
हमें यहाँ सदियों तो नहीं रहना है

6. Mujhko Bhi Tarkeeb Sikha Yaar Julahe

मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ तागा टुट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिराह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई
मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती है मेरे यार जुलाहे
मुझ को भी तरकीब सिखा मेरे यार जुलाहे

7. Sabr Har Baar Ikhtiyaar Kiya

सब्र हर बार इख़्तियार किया
हम से होता नहीं हज़ार किया
आदतन तुम ने कर दिए वादे
आदतन हम ने ए'तिबार किया
हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया
फिर न माँगेंगे ज़िंदगी या-रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया

8. Shaam Se Aankh Mein Nami Si Hai
Qalaam: Gulzar / Voice: Jagjit Singh

शाम से आँख में नमी सी है...
आज फिर आप की कमी सी है
दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है

9. Aahista Chal Zindagi

आहिस्ता चल ज़िन्दगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है,
कुछ दर्द मिटाना बाकी है, कुछ फ़र्ज़ निभाना बाकी है;
रफ्तार में तेरे चलने से कुछ रूठ गए, कुछ छुट गए ;
रूठों को मनाना बाकी है, रोतो को हसाना बाकी है ;
कुछ हसरतें अभी अधूरी है, कुछ काम भी और ज़रूरी है ;
ख्वाइशें जो घुट गयी इस दिल में, उनको दफनाना अभी बाकी है ;
कुछ रिश्ते बनके टूट गए, कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए;
उन टूटे-छूटे रिश्तों के ज़ख्मों को मिटाना बाकी है ;
तू आगे चल में आता हु, क्या छोड़ तुजे जी पाऊंगा ?
इन साँसों पर हक है जिनका , उनको समझाना बाकी है ;
आहिस्ता चल जिंदगी , अभी कई क़र्ज़ बाक़ी है

10. Haath Chhootein Bhi To Rishte Nahin Chhoda Karte

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते
जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें
इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते
जा के कोहसार से सर मारो कि आवाज़ तो हो
ख़स्ता दीवारों से माथा नहीं फोड़ा करते

11. Mujhe Andhere Mein Be-Shak Bitha Diya Hota

मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता
मगर चराग़ की सूरत जला दिया होता
न रौशनी कोई आती मिरे तआ'क़ुब में
जो अपने-आप को मैं ने बुझा दिया होता
ये दर्द जिस्म के या-रब बहुत शदीद लगे
मुझे सलीब पे दो पल सुला दिया होता
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी ने तो रुला दिया होता

12. Dard Halka Hai Saans Bhaari Hai

दर्द हल्का है साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आप के ब'अद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
दिन की चादर अभी उतारी है
शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
कैसी चुप सी चमन पे तारी है
कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है

13. Har Baat Ka Koi Jawab Nahi Hota

हर बात का कोई जवाब नही होता...,
हर इश्क का नाम खराब नही होता...!
यूं तो झूम लेते है नशे में पीनेवाले....,
मगर हर नशे का नाम शराब नही होता...!

खामोश चेहरे पर हजारों पहरे होते है....!
हंसती आखों में भी जख्म गहरे होते है....!
जिनसे अक्सर रुठ जाते है हम,
असल में उनसे ही रिश्ते गहरे होते है....!

किसी ने खुदा से दुआ मांगी.!
दुआ में अपनी मौत मांगी,
खुदा ने कहा, मौत तो तुझे दे दु मगर...!
उसे क्या कहु जिसने तेरी जिंदगी मांगी...!

हर इंन्सान का दिल बुरा नही होता....!
हर एक इन्सान बुरा नही होता.
बुझ जाते है दीये कभी तेल की कमी से....!
हर बार कुसुर हवा का नही होता..!!

Gulzar - Quote Cards

(transcribed from three image screenshots forwarded via email; no personal information present in the images)

1.
अपनी जिंदगी के सलीके कुछ यूं मोड़ दो ,,
जो तुम्हे नजरअंदाज़ करें उन्हें नजर आना छोड़ दो ।

2.
कैसे करें हम खुद को तेरे
प्यार के काबिल
जब हम आदतें बदलते हैं
तुम शर्तें
बदल देते हो

3.
हमने भी एक
ऐसे इंसान को चाहा
जिसे भूलना हमारे बस में नहीं
और पाना किस्मत में नहीं.

Harivansh Rai Bachchan

Bachan हरबंस राय
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई।।

~ हरिवंश राय बच्चन

पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नही

छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता ko
है न औरों की ज़बानी

अनगिनत राही गए

इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड पैरौं की निशानी

यह निशानी मूक होकर

भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा

व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ

यात्रा सरल इससे बनेगी
सोंच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना

हर सफल पंथी यही

विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान करले।

है अनिश्चित किस जगह पर

सरित गिरि गहवर मिलेंगें
है अनिश्चित किस जगह पर

बाग बन सुंदर मिलेंगे।

किस जगह यात्रा खतम हो

जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छूट जाएँगे

मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
~हरिवंशराय बच्चन

याद सुखों की आंसू लाती दुख की दिल भारी कर जाती
दोशकिसे दूँ जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूँ मैं
क्या भूलूँ कया याद करूँ मैं

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है!
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जाएँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पाएँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर, जो रोरोकर हमने ढोए,
महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा!
उर में एसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सोए!
अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूरकठिन को कोस चुके,
उस पार नियति का मानव से व्यवहार न
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे! ऐसी भी घड़ियाँ आऐंगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव रजनी तम की चादर से ढक देगी,
तब रविशशिपोषित यह पृथिवी कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबेचौड़े जग का अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब तेरा मेरा नन्हासा संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आएगा, कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदुनव पल्लव के स्वर 'भरभर' न सुने जाएँगे,
अलिअवली कलिदल पर गुंजन करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का अवसान, प्रिय हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु गर्जन निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज 'टलमल', सरिता अपना 'कलकल' गायन,
वह गायकनायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा!
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण!
संगीत सजीव हुआ जिनमें, जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का, जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा देखो माली, सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी ऊषा की साड़ी सिन्दूरी
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा पाएगा कितने दिन रहने!
जब मूर्तिमती सत्ताओं की शोभाशुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई हम सब को खींच बुलाता है!
मैं आज चला तुम आओगी, कल, परसों, सब संगीसाथी,
दुनिया रोतीधोती रहती, जिसको जाना है, जाता है।
मेरा तो होता मन डगडग मग, तट पर inही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

-हरिवंशराय बच्चन

Beautiful poem by Harivansh Rai Bachhan

यहाँ सब कुछ बिकता है , दोस्तों रहना जरा संभाल के !!!
बेचने वाले हवा भी बेच देते है , गुब्बारों में डाल के !!!
सच बिकता है , झूट बिकता है, बिकती है हर कहानी !!!

तीन लोक में फेला है , फिर भी बिकता है बोतल में पानी!!!
कभी फूलों की तरह मत जीना,
जिस दिन खिलोगे... टूट कर बिखर्र जाओगे ।
जीना है तो पत्थर की तरह जियो;
जिस दिन तराशे गए... "खुदा" बन जाओगे ।।

--हरिवंशराय बच्चन

अगर बिकी तेरी दोस्ती…
तो पहले ख़रीददार हम होंगे..!
तुझे ख़बर न होगी तेरी क़ीमत ..
पर तुझे पाकर सबसे अमीर हम होंगे..!!
दोस्त साथ हो तो रोने में भी शान है..
दोस्त ना हो तो महफिल भी समशान है!

सारा खेल दोस्ती का है ऐ मेरे दोस्त,
वरना जनाजा और बारात एक ही समान है !! ….

•
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यह कफन यह जनाजे यह सब बातें हैं दोसतो
वरना मर तो इनसान तभी जाता जब कोई याद करने वाला न हो
यह समंनदर भी तेरी तरह खुदगरज निकला
जिये तो तैरने ना दिया और मर गये तो डूबने ना दिया

Jan Nisar Akhtar - Collection

(three ghazals; this email had each one repeated 2-3 times from being forwarded, duplicates removed)

1. Har Ek Rooh Mein Ek Gham Chhupa Lage Hai Mujhe

हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे
ये ज़िंदगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे
पसंद-ए-ख़ातिर-ए-अहल-ए-वफ़ा है मुद्दत से
ये दिल का दाग़ जो ख़ुद भी भला लगे है मुझे
जो आँसुओं में कभी रात भीग जाती है
बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे
मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में
तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे
मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह
ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे
न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है
कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे
बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद
हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे
अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए
अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे
हिकायत-ए-ग़म-ए-दिल कुछ कशिश तो रखती है
ज़माना ग़ौर से सुनता हुआ लगे है मुझे

2. Dil Ko Har Lamha Bachate Rahe Jazbaat Se Hum

दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम
इतने मजबूर रहे हैं कभी हालात से हम
नश्शा-ए-मय से कहीं प्यास बुझी है दिल की
तिश्नगी और बढ़ा लाए ख़राजात से हम
आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से
चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम
इश्क़ में आज भी है नीम-निगाही का चलन
प्यार करते हैं उसी हुस्न-ए-रिवायात से हम
मर्कज़-ए-दीदा-ए-ख़ुबान-ए-जहाँ हैं भी तो क्या
एक निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम

3. Zindagi Yeh To Nahin Tujhko Sanwara Hi Na Ho

ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हम ने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो
ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का...
(source email cuts off here)

Jigar Muradabadi

Haay Ri Majbooriyaan
Poet: Jigar Muradabadi

hā.e-rī majbūriyāñ tark-e-mohabbat ke liye
mujh ko samjhāte haiñ vo aur un ko samjhātā huuñ maiñ

merī himmat dekhnā merī tabī.at dekhnā
jo sulajh jaatī hai gutthī phir se uljhātā huuñ maiñ

vāh-re shauq-e-shahādat kū-e-qātil kī taraf
gungunātā raqs kartā jhūmtā jaatā huuñ maiñ

dekhnā is ishq kī ye turfa-kārī dekhnā
vo jafā karte haiñ mujh par aur sharmātā huuñ maiñ

ek dil hai aur tūfān-e-havādis ai 'jigar'
ek shīsha hai ki har patthar se Takrātā huuñ maiñ

Jo zaraa sii pii ke behak gayaa, us'e mai-kade se nikaal do.
Yahaa.n tang-nazar kaa guzar nahii.n, yahaa.n ahl-e-zarf kaa kaam hai.
(Ahl-e-zarf = capacity for enlightenment)

Kaifi Khaleel - Mujhe Pyaar Hua Tha

Poet: Kaifi Khaleel
Kahani Sono, Zubani Sono
कहानी सुनो जुबानी सुनो
मुझे पयार हुआ था इकरारo
दीवाना हुआ मसताना हुआ
तेरी चाहत में कितना फसाना हुआ
तेरे आने की खुशबु तेरे जाने का मनजर
तुझे मिलना पडेगा अब जमाना हुआ
सदाये सुनो तुम जफाये सुनो
मुझे पयार हुआ था इकरार हुआ था
है तमंना हमें तुमहे दुलहन बनाये
तेरे हांथो पे महंदी अपने नाम की सजायें
तेरी ले लें बलाये तेरे सदके उतारे
है तमंना तुमहे अपना बनाये नही मुशकिल वफा जरा दे खों यहां
तेरी आंखो में बसता है मेरा जहां कभी सुन लो जरा जो मैं कह ना सका
मेरी दुनिया तुमही हो तुमही आसरा
In
दुआंये सुनो हां सजांये सुनो
मुझे पयार हुआ था इकरार हुआ था
Hai Tamanna Meri Tere Hathon Pe Mehendi Apne Nam Ki Sajayein,
Mujhe Pyar Hua Tha Ikrar Hua Tha,
I had fallen in love. I had confessed to it.
Kahani Suno Zubani S

Kateel Shifai

किस तरह अपनी मोहब्बत की मै तकलीम करूँ

हमें-ए-हसती भी तो है शामिल गमे-ए-यार के साथ

लाज़िमी तो नही वो तुझे मिल ही जाये
हर ख़्वाब की तकलीम नही हो सकती

Khalil-ur-Rehman Qamar

अशरे नादां से कहो बाद में पछतायेगें आप गिरकर मेरी आँख से किधर जायेगें
अपने लफ़्ज़ों के तकलुम को गिरा कर जाना अपने लहजें की थकाावर में बिखर जायेगें
तुम से छीन कर ले जायेंगे वादे अपने अब तो क़समों की सदाक़त से भी डर जायेंगें
इक तेरा घर था मेरी हदें मुसातिम लेकिन अब ये सोचा है के हम हद से गुजर जायेगें
अपने अर्फकार जला डालेगें कागज कागज। सोच मर जायेगी तो हम आप भी मर जायेंगे
इससे पहले कि जुदाई की खबर तुम से मिले हम ने सोचा है कि हम तुम से बिछड़
जायेगेंjuj

Majaz Lucknowi

wahshat-e dil kya karoon
Finding love in revolution; revolution in love!
Rekhta
February 15, 2019

Anisur Rahman

Asrar-ul-Haq Majaz (1911-1955), also known as Majaz Lakhnavi, has
traditionally been called a poet of romance and revolution. Rightly so, for
he excelled as a poet who could artfully weave the two strains together.
Indeed, he found love in revolution and revolution in love.
Majaz is also known for leading an unconventional life. Poets are often
known for doing this. But Majaz excelled here again. He loved the
companionship of women; some of them enamoured him intensely. He wrote
quite a few of his verses celebrating them but quite often only secretly:

Poets write for their beloveds—sometimes on asking, at others on their own.
One does not really know if Majaz was really asked to write this verse but
he writes as if he was asked to:

In love, one lives an imaginary life, as well as a real one. Majaz
configured a moment of close companionship when he wrote:
Mere pehlu ba pehlu jab wo chalti thi gulistan mein
Faraaz-e aasmaan per kahkashaan hairat se takti thi
This experience made him configure his beloved as differently as this:

Constraints in love are killing; they make one suffer immeasurably.
Realities of life make the lovers suffer in silence without ever finding a
way to resolution. Majaz also experienced such a moment of his helplessness
in love:

Such moments of helplessness lead to despair and finally to breaking of all
bonds. Tragically enough, Majaz too had to pen a verse as helpless as this:

In putting a question about what to do now, Majaz also proposed a
quintessential answer that love does not necessarily lead to union. He was
desperate yet full of conviction. He came up with greater courage and
expressed himself with better courage than before:

Love matters but not necessarily the names that figure in the story of
lovers. In the genuine and honest story of Majaz, there are quite a few
names. He loved beauteous being who happened to be now Gauhar, now Hameeda,
now Zehra, now Surayya, now Kaneez. All of them stand out as incarnations
of his desire—the unfulfilled desires of a poet who lived, loved, and died
of excessive drinking.

Manav Kaul - Collected Reflections

Poet: Manav Kaul

थोड़े में बहुत कुछ देख लेना,
और बहुत कुछ होने पर, हमारा आँखे बंद कर लेना।
मैं कभी-कभी अपना सबसे खूबसूरत सपना याद करता हूँ।
मेरा सबसे खूबसूरत सपना भी कभी,
बहुत खूबसूरत नहीं था।
मेरे सपने भी- थोड़ी सी खुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं,
जैसे कोई चिड़िया अपना खाना चुगती है।
पर जब उसे एक पूरी रोटी मिलती है
तो वो पूरी रोटी नहीं खाती है,
तब भी वो उस रोटी में से.... रोटी
चुग रही होती है।
बहुत बड़े आकाश में भी हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं..।
देखने के लिए हम बहुत खूबसूरत और बड़ा आसमान देख सकते हैं।
पर जीने के लिए...
हम उतना ही आकाश जी पाऎंगे...
जितने आकाश को हमने,
अपने घर की खिड़की में से जीना सीखा है।

आवाज़े ... और ढेरों बातें, फिर उन बातों से निकली दूसरी बातें। खोखले शब्द ..
इन शब्दों से बने वाक्य और उन वाक्यों से बने चित्र कितने झूठे हैं। कितना चुप
रहना पड़ता है तब कही जाकर वो सारे चित्र पिघलना शुरू होते हैं। बहुत चुप रहने
पर ही दिखना संभव होता है। तब लगता है कि कितना धुँधला जिए जा रहे थे। कुछ भी
कहना अंत में आवश्यक नहीं है।
कितना मन करता है वो हो जाओ जो असंभव है। कितना मन करता है कि उसे संभव करे जो
चुप है।

जैसे ठंड के दिनों में सुबह ताँगे पर बैठकर स्कूल जाना, परिक्षा के दिनों में
खेलने के आधे घंटे का सुख चुरा लेना, अपने घर के अंधेरे कोने में एक छोटा घर
बनाकर घर-घर खेलना, लंबी दौपहरों में देर तक म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान पर
बैठे रहना, कबीट ख़ाते हुए रामलीला में डरते हुए ताड़का वद्ध देखना, नदी में
लंबे गोते लगाकर दस पैसे का मिल जाना, एक कचौड़ी और थोड़ी सी जलेबी के लिए कई
दिन इंतज़ार करना, पड़े हुए पैसे मिल जाने के ख़्वाब देखना और फिर देर तक
कल्पना में जीना कि कैसे खर्च करुंगा उन्हें, मज़ार पर जाकर अपने भगवान की
बुराई करना, बहुत चालाक हो जाने की इच्छा रखना, बारिश को सूँघने की इच्छा रखना
और भीग जाना, बेंजो सीख़ना पर दिल में तबला बजाने के ख़्वाब देखना, बाहर जाना
और वापिस घर कभी ना आने की ज़िद्द पालना, दोपहर की कड़क धूप में कैंची साइकल
सीखना। पीपल, ईमली को छोड़ना और बरगद की छाया तलाशना, माँ के होने में माँ को
खोजना, घर से निकलना और बार-बार घर वापिस आना...। इन सबमें कहीं कविता है...
पर कविता यह नहीं है। कविता हमेशा किसी के लिए होती है। निजी से निजी चीज़ भी
किसी के लिए होती है। शायद कई दिनों बाद खुदी के पढ़ने के लिए भी हो सकती है
पर हमारे अवचेतन मे हमें हमेशा पता होता है कि किसके लिए है। यह जीवन असल में
एक ख़त है... किसी के लिए... पूरा जी लेने के बाद हम चाहते हैं कि बुढ़ापे में
एक दिन हम बरामदे में किसी बरगद की छाया तले बैठे हुए चाय पी रहे होंगे...
हल्की मुलायम धूप होगी और उस दिन कांपते हाथों से मैं अपना जीवन...जो कि एक
ख़त सा किसी लिफाफे में होगा, उसे खोलूंगा और उस किसी को वह ख़त पढकर
सुनाऊंगा। उसे मेरा जीवन एक काल्पनिक कहानी लगेगा... और मैं उस कल्पना में
किसी जंगल में चलते हुए उस कहानी के सारे झूठ उसके साथ फिर जी लूँगा।

छोटे-छोटे न मालूम कितने सारे संबंधो के सिरे,
गिनता बैठा था।
जो कुछ छूट गए हैं,
ओर जो कुछ छूटने को हैं।

जो संबंध छूट गए हैं, वो कहानी बन गए हैं,
जिन्हें कहते-सुनते, हमारा वक़्त गुज़र जाता है।

पर जो संबंध छूटने को हैं,
वो अभी, इस वक्त वैसे है जैसे....
आपकी पतंग कटने के बाद,
जब कोई बच्चा आपके मांझे को कहीं ओर पकड़ लेता है।
वो उस छोर पर खड़ा होकर इंतज़ार करता है।
संबंध को न तो तोड़ता है ना छोड़ता है
पतंगबाज़ो के अनुसार....
जो संबंध को पहले खींचके तोड़ेगा,
उसके पास सबसे कम मांझा आएगा।

धैर्य- परिक्षा धैर्य की होती है।
क्योंकि बात कहानी में नायक होने की है।
ग़र उसने संबंध पहले तोड़ा,
तो कहानी आपकी है... ओर नायक भी आप ही हैं।
पर अग़र आपका धैर्य टूट गया...
तो पूरी ज़िन्दगी कहानी में आपकी भूमिका,
खलनायक की ही होगी।

Munavvar Rana

This is an extract from Munavvar Rana's long poem, Mohajirnama, a lament by
the Muslims who had to leave their homes and go to Pakistan . I wonder,
the very few of those alive today would now say it was good that they did.

मोहाजिर (Mohaajir).
Mohajirs are the Urdu speaking Muslims who went to Pakistan,mainly from UP
to Karachi at the time of Partition.

मोहाजिर हैं! मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं.

कई आँखें अभी तक, ये शिकायत करती रहती हैं,
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं.

शकर इस जिस्म से, खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
कि हम जामन के पेड़ों को, अकेला छोड़ आए हैं.

गले मिलती हुई नदियाँ, गले मिलते हुए मौसम,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं.

कल इक अमरूद वाले से, ये कहना पड़ गया हमको,
जहाँ से आए हैं, इस फल की बगिया छोड़ आए हैं.

वो हैरत से हमें तकता रहा कुछ देर, फिर बोला,
वो संगम का इलाक़ा छुट गया, या छोड़ आए हैं?
अभी हम सोच में गुम थे, कि उससे क्या कहा जाए,
हमारे आँसुओं ने राज़ उगला, छोड़ आए हैं.

यह ख़ुदगर्ज़ी का जज़्बा, आज तक हमको सताता है,
कि हम बेटे तो ले आए, भतीजा छोड़ आए हैं.
भतीजी अब सलीक़े से, डुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको, हुमकता छोड़ आए हैं.

हमारी अहलिया तो आ गईं, माँ छुट गई आख़िर,
कि हम पीतल उठा लाए हैं, सोना छोड़ आए हैं.

तू हमसे चाँद! इतनी बेरुख़ी से बात करता है,
हम अपनी झील में, एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं.
ख़याल आता है अक्सर धूप में बाहर निकलते ही
हम अपने गाँव में पीपल का साया छोड़ आए हैं

ज़मीं-ए-नानक-ओ-चिश्ती, ज़बान-ए-ग़ालिब-ओ-तुलसी
ये सब कुछ था पास अपने, ये सारा छोड़ आए हैं
दुआ के फूल पंडित जी जहां तकसीम करते थे
गली के मोड़ पे हम वो शिवाला छोड़ आए हैं

बुरे लगते हैं शायद इसलिए ये सुरमई बादल
किसी की ज़ुल्फ़ को शानों पे बिखरा छोड़ आए हैं
अब अपनी जल्दबाजी पर बोहत अफ़सोस होता है
कि एक खोली की खातिर राजवाड़ा छोड़ आए हैं

ये दो कमरों का घर, और ये गुज़रती ज़िन्दगी अपनी,
वहाँ इतना बड़ा, नौकर का कमरा my छोड़ आए हैं.
हँसी आती है, अपनी ही अदाकारी पे ख़ुद हमको,
बने फिरते हैं यूसुफ़, और ज़ुलेखा छोड़ आए हैं.

किसी की आरज़ू के पाँव में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली d
I में फंदा छोड़ आए हैं.

वो ख़त, जिस पर तेरे होठों ने अपना नाम लिक्खा था,
तेरे काढ़े हुए तकिए पे, रखा छोड़ आए हैं.

गए वक़्तों की अलबम, देखने बैठे तो याद आया,
हम एक चेहरे में, अपना नाक-नक़्शा छोड़ आए हैं.
उधर का कोई मिल जाए, इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आए हैं, कि चश्मा छोड़ आए हैं.

हमें मरने से पहले, सबको ये ताक़ीद करनी है,
किसी को मत बता देना, कि क्या क्या छोड़ आए हैं.
बहुत कम दाम में, बनिये ने खेतों को ख़रीदा था,
हम इसके बावजूद, उस पर बक़ाया छोड़ आए हैं.
ज़मीनें मुन्तक़िल करते हुए, इक कोरे कागज़ पर,
अँगूठा कब लगाया था, अँगूठा छोड़ आए हैं.

मोहाजिर हैं! मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं.

Chehare tamam dhundle
चेहरे तमाम धुँधले नज़र र आ रहे है क्यों
क्यू ख़्वाब रतजगो के महलों में दब गये
चेहरे तमाम धुँदले नज़र आ रहे हैं क्यूँ
क्यूँ ख़्वाब रतजगों की हवेली में दब गए
है कल की बात उँगली पकड़ कर किसी की मैं
मेले मैं घूमता था खिलौनों के वास्ते
जितने वरक़ लिखे थे मिरी ज़िंदगी ने सब
आँधी के एक झोंके में बिखरे हुए हैं सब
मैं चाहता हूँ फिर से समेटूँ ये ज़िंदगी
बच्चे तमाम पास खड़े हैं बुझे बुझे
शोख़ी न जाने क्या हुई रंगत कहाँ गई
जैसे किताब छोड़ के जाते हुए वरक़
जैसे कि भूलने लगे बच्चा कोई सबक़
जैसे जबीं को छूने लगे मौत का अरक़
जैसे चराग़ नींद की आग़ोश की तरफ़
बढ़ने लगे अँधेरे की ज़ुल्फ़ें बिखेर कर
भूले हुए हैं होंट हँसी का पता तलक
दरवाज़ा दिल का बंद हुआ चाहता है अब
क्या सोचना कि फूल से बच्चों lका साथ है
अब मैं हूँ अस्पताल का बिस्तर है रात
Hai

तुम अपनी सुबह के रगं लिख के अपनी रातों के ख़्वाब लिखना
बस इतना करना जहाँ भी रहना मेरे ख़तों के जवाब लिखना
फिर इतनी फ़ुरसत किसे मिलेगी के मिल के बैठे तो हाल पुछे
मगर ख़तों में हर एक वादे हर इक क़सम का हिसाब लिखना
मुझेतो क़रीब रह कर भी ख़ैर जो जो अजियते दीं
तुम अब जुदाई के मौसम उठाना जो जो अजांब लिखना
तेरी परेशानियों की ख़बरें यह दुखती आँखें ना पढ़ सकेंगीं
बदन में काटें भी चुभ रहें हों हर्फ़ मगर तुम गुलाब लिखना
हज़ार बातें है चार राते हैं उससे क्या क्या कहोगे खावर
वो चेहरा पढ़ पढ़ के याद कर लो वो जा चुके तो किताब लिखना

Hawa

हव थमी थी ज़रूर लेकिन....बड़ी ही मुदत गुज़र चुकी थी
वो शाम जैसे सिसक रही थी,,,,,
के जरद पतों को आँधियों ने
अजीब क़िस्सा सुना दिया था कि जिसको सुन कर तमाम पते
सिसक रहे थे बिलख रहे थे
न जाने किस सानीहे accident)के
के ग़म में शजर जड़ो से उखड़ रहे थे
बहुत तलाशा था हमने तु toमको
हर एक रास्ता हर एक वादी हर एक पर्वत हर एक घाटी
कही से तेरी ख़बर ना आई
तो कह के यह हमने दिल को टाला..... हवा थमेगी तो देख लेगें
हम उसके रस्तो को ढूँढ लेंगे, मगर हमारी यह ख़ुश ख़याली
जो हम को बरबाद कर गई थी हवा थमी थी ज़रूर लेकिन
बड़ी ही मुदत गुज़र चुकी थी
हमारे बालों के जंगलों में सफ़ेद चाँदी उतर चुकी थी
फलक पे तारे नही रहे थे,,,,, गुलाब प्यारे नही रहे थे
वो जिन से बसती थी दिल की बसती
वो लोग सारे नही रहे थे
मगर यह आलम सब से बलातर
के हम तुम्हारे नहीं रहे थे
के तुम हमारे नही रहे थे
हवा थमी थी ज़रूर लेकिन बड़ी ही मुदत गुज़र चुकी थी¡

Nida Fazli

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा

प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली
जिस को पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा

मिरे बारे में कोई राय तो होगी उस की
उस ने मुझ को भी कभी तोड़ के देखा होगा

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
निदा फ़ाज़ली

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला
उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मा'लूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
दूर के चाँद को ढूँडो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला
इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला
—————
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर

सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर

तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी
गुमनाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर

रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर इस के बा'द थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

—————-⛷
Milta Lyrics

Kabhi kisi ko mukammal jahan nahi milta
Kahin zameen to kahin aasman nahin milta

Jise bhi dekhiye woh apne aap mein ghum hai

Zuban mili hai magar hum-zuban nahin milta
Bujha saka hai bhala kaun waqt ke shooter
Yeh aisi aag hai jismein dhuaan nahin milta

Tere jahan mein aisa nahin ki pyaar na ho

Jahan ummeed ho iski wahan nahin milta

Nida fazli

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मा'मूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया

——//—/-/-///

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए
जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चराग़ों को हवाओं से बचाया जाए
ख़ुद-कुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए
क्या हुआ शहर को कुछ भी तो दिखाई दे कहीं
यूँ किया जाए कभी ख़ुद को रुलाया जाए
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए
—————
Jab kisi se koi gila rakhna , saamne apne aaina rakhna
(Whenever you have a complaint against anyone, make sure you have a mirror
in front of you)
Yun ujaalon se waasta rakhna , shama ke paas hi hawa rakhna
(Have such a relationship with light , make sure you have a source of wind
near the flame)
Ghar ki taaveer chaahe jaisi ho , ismein rone ki kuch jagah rakhna I
(No matter what the purpose ouf a home is for you , leave some space in it
to cry )
Masjidein hai namaziyon ke liye , apne ghar mein kahin khuda rakhna
(Mosques are for those who read the namaaz, Somewhere in your house let the
Lord )
Milna julna jahan zaruri ho , Milne julne ka Hausla rakhnaa
Masjidein hai namaziyon ke liye , apne ghar mein kahin khuda rakhna
(Mosques are for those who read the namaaz, Somewhere in your house let the

यहाँ भी, वहाँ भी
इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी
खूँख्वार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं
शहरों में बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी
रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी
हिंदू भी मज़े में है‚ मुसलमाँ भी मजे में
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी
उठता है दिलो–जाँ से धुआँ दोनों तरफ ही
ये मीर का दीवान यहाँ भी है वहाँ भी

Parveen Shakir - Collection

अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे
परवीन शाकिर

Parveen shakir
Lłlppļ

Please

अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो मुझ को न समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में
मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

मैं तो उस दिन से हिरासाँ हूँ कि जब हुक्म मिले
ख़ुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

कोई आहट कोई आवाज़ कोई चाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई

-------

अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ
मगर ये दिल तिरी जानिब से साफ़ भी न हुआ

तअ'ल्लुक़ात के बर्ज़ख़ में ही रखा मुझ को
वो मेरे हक़ में न था और ख़िलाफ़ भी न हुआ

अजब था जुर्म-ए-मोहब्बत कि जिस पे दिल ने मिरे
सज़ा भी पाई नहीं और मुआ'फ़ भी न हुआ

मलामतों में कहाँ साँस ले सकेंगे वो लोग
कि जिन से कू-ए-जफ़ा का तवाफ़ भी न हुआ

अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई
बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ

हवा-ए-दहर हमें किस लिए बुझाती है
हमें तो तुझ से कभी इख़्तिलाफ़ भी न हुआ
———-
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर

हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

परवीन.

मुझे मत बताना
कि तुम ने मुझे छोड़ने का इरादा किया था
तो क्यूँ
और किस वज्ह से
अभी तो तुम्हारे बिछड़ने का दुख भी नहीं कम हुआ
अभी तो मैं
बातों के वादों के शहर-ए-तिलिस्मात में
आँख पर ख़ुश-गुमानी की पट्टी लिए
तुम को पेड़ों के पीछे दरख़्तों के झुण्ड
और दीवार की पुश्त पर ढूँडने में मगन हूँ
कहीं पर तुम्हारी सदा और कहीं पर तुम्हारी महक
मुझ पे हँसने में मसरूफ़ है
अभी तक तुम्हारी हँसी से नबर्द-आज़मा हूँ
और इस जंग में
मेरा हथियार
अपनी वफ़ा पर भरोसा है और कुछ नहीं
उसे कुंद करने की कोशिश न करना
मुझे मत बताना.....
स्रोत:
• पुस्तक : kulliyaat-e-maahe tamaam (khud kalaamii) (पृष्ठ 123)

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की
The news of our affinity has spread to every door
He welcomed me like fragrance which he did adore
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
How can I say that I have been deserted by my beau
Its true but this will cause me to be shamed for evermore
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
Each time he deserted me, came back to me once more
I like this very aspect of my faithless paramour
तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
Just as your heart is full of love, be dear ones by your side
May pain of long and lonely nights be never in your store
उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की
When he gently placed his hand upon my burning brow
It was as though the saviour's touch had infused my core
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा ke
हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा
वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है
एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा
वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए
मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा
आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी
तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा
मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस
जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा

•

इस इश्क़ का ताउम्र मुझे यह मलाल रहेगा
हुआ कयू था तुमसे यह सवाल रहेगा

तिरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई
शब-ए-फ़िराक़ है या तेरी जल्वा-आराई
तू किस ख़याल में है मंज़िलों के शैदाई
उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई
पुकार ऐ जरस-ए-कारवान-ए-सुब्ह-ए-तरब
भटक रहे हैं अंधेरों में तेरे सौदाई
ठहर गए हैं सर-ए-राह ख़ाक उड़ाने को
मुसाफ़िरों को न छेड़ ऐ हवा-ए-सहराई
रह-ए-हयात में कुछ मरहले तो देख लिए
ये और बात तिरी आरज़ू न रास आई
ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई
दिल-ए-फ़सुर्दा में फिर धड़कनों का शोर उठा
ये बैठे बैठे मुझे किन दिनों की याद आई
मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तिरे पहलुओं से आँच आई
जहाँ भी था कोई फ़ित्ना तड़प के जाग उठा
तमाम होश थी मस्ती में तेरी अंगड़ाई
खुली जो आँख तो कुछ और ही समाँ देखा
वो लोग थे न वो जलसे न शहर-ए-रानाई
वो ताब-ए-दर्द वो सौदा-ए-इंतिज़ार कहाँ
उन्ही के साथ गई ताक़त-ए-शकेबाई
फिर उस की याद में दिल बे-क़रार है 'नासिर'
बिछड़ के जिस से हुई शहर शहर रुस्वाई

————-

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा
इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा
इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा
यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा
काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा
किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी
सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी
दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें
शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी
उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं
उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी
गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब
उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी
उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी
शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी

Kesi be-chehra ruttain aaiyn watan mein ab ke, Phool aangan mein khile hain
na chaman mein ab ke, Baraf
ke hath hi,hath aaiyn gay,ay mauj-e-havua, Hiddatain mujh mein,na khushboo
ke badan mein,ab ke. (Parveen Shakir)

इतना मालूम है!
परवीन शाकिर
•

अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़
सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में
रोज़ की तरह से वो आज भी आया होगा
और जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?

N.

Parveen Shakir - Mohabbat Cheez Aisi Hai

Poet: Parveen Shakir
Mohabbat Cheez Aisi Hai मुहब्बत चीज़ ऐसी है
कभी होती है अपनों से
कभी अनजान राहों से
कभी गुमनाम राहो से

मुहब्बत चीज़ ऐसी है
कभी होती है फुलो से
कभी बचपन के झुलो से
कभी बे-इख़्तियारी मे
कभी पके असुलो से

मुहब्बत चीज़ ऐसी है
मुहबबत बस मुहब्बत है
मुहब्बत इक सदाक़त है

दुखों में रोल देती है
ज़ख़्म अनमोल देती है
ज़हर भी घोल देती है
मुहब्बत चीज ऐसी है

Sahir Ludhianvi

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें
शबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखें

आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती
तुलता है बशर जिस में वो मीज़ान हैं आँखें

आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को
अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें

लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती
इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें

आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे
दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान! हैं होती है

कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है

वो न आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को
वो जो आये तो ख़लिश और जवाँ होती है

(ख़लिश = चुभन, वेदना)

रूह को शाद करे, दिल को जो पुरनूर करे
हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है

(शाद = प्रसन्न), (पुरनूर = प्रकाशमान, ज्योतिर्मय), (तनवीर = रौशनी, प्रकाश)

ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत को कहाँ तक रोकें
दिल में जो बात हो आँखों से अयाँ होती है

(ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत = मुहब्बत की बाढ़ की सहनशीलता), (अयाँ = साफ़ दिखाई
पड़ने वाला, स्पष्ट, ज़ाहिर)

ज़िन्दग़ी एक सुलगती-सी चिता है 'साहिर'
शोला बनती है न ये बुझ के धुआँ होती है

-साहिर होशियारपुरी
साहिर

Waseem Barelvi - Janam Janam Maangungi

Janam Janam Maangungi Tujhko
Poet: Waseem Barelvi

Janam janam maangu gi tujko
Tu mujko thukraana
Mai maati mei.n mil jaaunge
Tu maati ho jaana
Lehar Ke aage kya ek tinke ki aukaat
Sajan, Mai.n bhool gaye yeh baat

tu ambar ki aankh ka tara mere chote haath,
sajan mai-n bhool gayi ye baat,
tujh ko saare man se chaaha chaaha saare tan se,
apne poore pan se chaaha aur adhure pan se,
pani ki ek boond kaha-n aur kaha-n bhari barsaat,
sajan mai-n bhool gayi ye baat,
janam janam mangungi tujh ko tu mujh ko thukraana,
mai-n maati me mil jaaungi tu maati ho jaana,
lehar ke aage kya ek tinke ki auqaat
sajan mai-n bhool gayi ye baat,
teri oor hi dekha mene apni oor na dekha,
jab jab barhna chaha paaounv se lipti lachman rekha,
mai-n apne bhi saath nahi-n thi tere duniya saath,
sajan mai-n bhool gayi ye baat,

Zakiya - Munsifon Saleebon Mein

Poet: Zakiya (attribution found on a duplicate copy of this ghazal elsewhere in the collection - tentative, unverified)

मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले नहीं होते
बेसबब बग़ावत से सानिये नहीं होते
सोच कर जुदा होना फिर के मिल ना पायेंगे
कयू की इस जमाने में मोजंजे नहीं होते
जो भी थे गिले शिकवे दूर कर के जाना था
कम से कम जुदाई में दिल बुरे नहीं होते

Munsifo saleeboN par faisle nahin hote
Besabab baghawat ke sanihe nahin hote
Soch kar juda hona, phir ke mil n paaenge
Kyun ke is zamane mein mojize nahin hote
Jo bhi the gile shikwe, door kar ke jaana tha
Kam se kam bichadne par dil bure nahin hote
Dard boegaa sawan phir se kachche aangan mein
Kaash pehli barish mein ham mile nahin hote
Chand se kaha ham ne tum hi raat bhar jaago
Ham se us ki yaadon mein ratjage nahin hote

Zehra Nigah - Jungle Ka Dastoor

Poet: Zehra Nigah (attribution found within the file; sometimes miscredited online to Parveen Shakir - a "Parveen Shakir" mention also appeared in the source and has been left out of the poem text below since it looks like a mix-up, not a second author)

सुना है जगंलो का भी कोई दसतूर होता है
सुना है शेर का जबपेट भर जाये तो वो हमला नहीं करता
किसी घने दरखत के नीचे ले ट जाता है
रात मे अगर अडांगिर पडे घोंसले से तो सुना है सारा जंगल ज्गता है
हवा के तेज झोकौं ले जब पेड हिलते हैं तो मैना अपने बचो को छोड कर कवे के अनडो
को अपने परो में थाम लेती है
सुना है घौंसले से कोई बचा गिर जाये तो सारा जंगल जाग जाता है
नदी में बाढ आ जाये या। कोई पुल टूट जााये तो किसी लकडी के तखते पर
गिलहरी सांप चीता और बकरी साथ होते हैं
सुना है जगंलो का भी कोई दसतूर होता है
खुदावनंदा जलीलो मोतबर
दाना और बीना मुंसिफो -ओ-अकबर
हमारे शहर में भी कोई जंगलो का ही दसतूर पैदा कर

Suna Hai Janglon Ka Bhi Koi Dastoor Hota Hai

Suna Hai Sher Ka Jab Pet Bhar Jaaye
To Wo Hamla Nahin Karta,
Suna Hai Jab Kisi Nadi Ke Paani Men
Bue Ke Ghonsle Ka Gandami Saaya Larazta Hai

To Nadi Ki Rupehli Machhliyaan Us Ko
Padosi Maan Leti Hain,

Hava Ke Tez Jhonke Jab Darakhton Ko Hilaate Hain
To Maina Apne Ghar Ko Bhool Kar

Kawwey Ke Andon Ko Paron Men Thaam Leti Hai
Suna Hai Ghonsle Se Jab Koi Bachcha Gire To

Saara Jangal Jaag Jaata Hai.
Nadi Men Baadh Aa Jaaye

Koi Pull Toot Jaaye
To Kisi Lakri Ke Takhte Per

Gilahri, Saanp, Cheeta Aur Bakri
Saath Hote Hain.

Suna Hai Janglon Ka Bhi Koi Dastoor Hota Hai,
Khuda-Wanda Jaleel-O-Mu'atabar, Daana-O Beena Munsif-O Akber,

Hamaare Shahar Men Ab,
Jangalon Ka Hi Koi Dastoor Naafiz Ker

Zubair Rizvi

#ज़ुबैररिज़्वी
तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना
मिरी आँखों पे अपनी दीद की इक शाम लिख देना
मुझे तुम शोहरतों c के दरमियाँ गुमनाम लिख देना
जहाँ दरिया मिले बे-आब मेरा नाम लिख देना टर
ये सारा हिज्र का मौसम ये सारी ख़ाना-वीरानी
इसे ऐ ज़िंदगी मेरे जुनूँ के नाम लिख देना
W
मिरे अंदर पनाहें ढूँडती फिरती है ख़ामोशी
लब-ए-गोया मिरे अंदर भी इक कोहराम लिख देना
वो मौसम जा चुका जिस में परिंदे चहचहाते थे
अब इन पेड़ों की शाख़ों पर सुकूत-ए-शाम लिख देना

शबिस्तानों में लौ देते हुए कुंदन से जिस्मों पर
हवा की उँगलियों से वस्ल का पैग़ाम लिख देना
@
#ज़ुबैररिज़वी
बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो
तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो
भटक जाती हैं तुम से दूर चेहरों के तआक़ुब में
जो तुम चाहो मिरी आँखों पे अपनी उँगलियाँ रख दो

बरसते बादलों से घर का आँगन डूब तो जाए
अभी कुछ देर काग़ज़ की बनी ये कश्तियाँ रख दो

धुआँ सिगरेट का बोतल का नशा सब दुश्मन-ए-जाँ हैं
कोई कहता है अपने हाथ से ये तल्ख़ियाँ रख दो

बहुत अच्छा है यारो महफ़िलों में टूट कर मिलना
कोई बढ़ती हुई दूरी भी अपने दरमियाँ रख दो

नुक़ूश-ए-ख़ाल-ओ-ख़द में दिल-नवाज़ी की अदा कम है
हिजाब-आमेज़ आँखों में भी थोड़ी शोख़ियाँ रख दो

हमीं पर ख़त्म क्यूँ हो दास्तान-ए-ख़ाना-वीरानी
जो घर सहरा नज़र आए तो उस में बिजलियाँ रख दो

#अशोकसाहनी
नेकी बदी की अब कोई मीज़ान ही नहीं
ईमाँ की बात ये है कि ईमान ही नहीं
इस दौर-ए-बे-ज़मीर पे क्या तब्सिरा करूँ
लगता है मेरे अहद में इंसान ही नहीं

कैसे रफ़ू करूँ मैं कहाँ से रफ़ू करूँ
दिल भी है मेरा चाक गरेबान ही नहीं

रूदाद-ए-दिल भी है ये ग़म-ए-काएनात भी
मेरी ग़ज़ल नशात का सामान ही नहीं

बरकत हमारे रिज़्क़ में आएगी किस तरह
घर में हमारे जब कोई मेहमान ही नहीं

लो वो अज़ाँ से सुब्ह की तस्दीक़ हो गई
गोया अब उस के आने का इम्कान ही नहीं